शिवम ने गुस्से और झिझक के बीच अपने पिता से कहा,
“मेरे घर मत आना। मैं और मेरी पत्नी नहीं चाहते कि हमारे बच्चे आपकी ज़िंदगी की कमज़ोरियाँ सीखें। आप हमेशा बच्चों को मेरे बचपन की बातें बताते हैं, और मुझे सबके सामने छोटा बना देते हैं। इससे मुझे बहुत तकलीफ़ होती है।”
उसके शब्द तीर की तरह थे। पिता कुछ नहीं बोले। बस अपनी चप्पल सीधी की और बिना देखे लौट गए।
शिवम को लगा, उसने सही किया। उसे अपने घर का “सम्मान” बचाना था। उसे लगता था कि उसके पिता असफल रहे, कमज़ोर रहे, और वही कमज़ोरी उसके बच्चों में न उतर जाए।
दिन बीतते गए। घर शांत था। कोई पुरानी कहानी नहीं, कोई टोका-टोकी नहीं। पर इस शांति में कुछ खाली-सा था। बच्चों ने एक दिन पूछा,
“पापा, दादाजी अब क्यों नहीं आते?”
शिवम ने टाल दिया,
“वो बिज़ी हैं।”
कुछ हफ्तों बाद खबर आई—पिता बीमार हैं। शिवम अस्पताल पहुँचा। वही आदमी, जिसे उसने “कमज़ोर” कहा था, अब बिस्तर पर लेटा था, पर आँखों में वही सादगी थी।
पिता ने धीमे से कहा,
“मैं तुम्हें छोटा नहीं करना चाहता था, बेटा। मैं बस उन्हें बताता था कि तुम कैसे मुश्किलों से निकले। ताकि वे समझें—कमज़ोरी से भी ताकत निकलती है।”
शिवम चुप रह गया। उसे याद आया—वह बचपन में कैसे गरीबी में पढ़ा, कैसे पिता ने अपने सपने छोड़कर उसे आगे बढ़ाया।
पिता ने आगे कहा,
“अगर मेरी बातें तुम्हें चोट देती थीं, तो माफ़ करना। मैं बस तुम पर गर्व करता था।”
शिवम की आँखें भर आईं। उसे समझ आ गया—जिसे वह “नुकसान” समझ रहा था, वही असल में उसकी जड़ों की कहानी थी।
वह पिता का हाथ पकड़कर बोला,
“पापा, घर आपके बिना सूना है। आइए… बच्चों को बताइए कि कमज़ोरी से भी इंसान बनता है।”
उस दिन शिवम ने जाना—शर्म अतीत से नहीं, उसे नकारने से आती है। और घर वही होता है, जहाँ अपने होने की इजाज़त हो।