लघु कथा – 34

रविन्द्र ने जिस दिन अपना घर छोड़ा था, उसे लगा था कि वह बहुत बड़ा कदम उठा रहा है—आजाद होने का, अपने सपनों को जीने का। माँ की नम आँखें, पिता की चुप्पी और आँगन में खड़ी नीम की छाँव—सब उसे पीछे खींच रहे थे, पर वह आगे बढ़ गया।
शहर बड़ा था, चमकदार था। नौकरी मिली, पैसा आया, दोस्त बने। पर जितना वह ऊपर जाता गया, उतना ही भीतर खाली होता गया। उसे कभी माँ के हाथ की बनी दाल याद आती, कभी पिता का बिना कहे समझ जाना। वह फोन करता, पर जल्दी काट देता—काम का बहाना, थकान का बहाना।
साल बीतते गए। एक दिन उसे गाँव से खबर मिली—पिता बीमार हैं। वह दौड़ता हुआ पहुँचा। वही कच्चा रास्ता, वही नीम का पेड़, पर आँगन सूना था। पिता चारपाई पर लेटे थे, आँखें कमजोर, आवाज़ धीमी। रविन्द्र उनके पास बैठा तो पिता ने बस इतना कहा,
“आ गया बेटा?”
रविन्द्र रो पड़ा। उसे लगा जैसे सारी सफलता उस एक वाक्य के आगे छोटी पड़ गई हो।
माँ रसोई में थी। उसने बेटे को देखा, तो हाथ से आँचल गिर पड़ा। बिना कुछ कहे उसके सिर पर हाथ रखा। रविन्द्र को लगा, यही तो वह जगह है जहाँ उसकी सारी थकान उतर जाती है।
उस रात वह अपने पुराने कमरे में सोया। दीवारों पर बचपन की खरोंचें थीं, छत पर वही पुराना पंखा। उसे याद आया—कैसे वह कभी यहाँ से भाग जाना चाहता था। अब उसे लग रहा था—कहीं असली घर से तो वह तब ही दूर नहीं हो गया था?
सुबह पिता ने धीरे से कहा,
“घर छोड़ना गलत नहीं था, बेटा। पर घर को भूल जाना गलत था।”
ये शब्द रविन्द्र के दिल में गहरे उतर गए। उसे समझ आ गया—वह बाहर तो बहुत आगे बढ़ गया, पर भीतर पीछे रह गया।
कुछ दिन बाद वह वापस शहर लौटा, पर इस बार अलग इंसान बनकर। उसने तय किया—अब घर सिर्फ यादों में नहीं रहेगा। वह हर महीने आएगा, हर दिन बात करेगा, हर फैसले में माँ-पिता को जगह देगा।
एक साल बाद वह हमेशा के लिए लौट आया। नौकरी छोड़कर नहीं, बल्कि नौकरी को गाँव के पास ले आया। उसने उसी नीम के नीचे कुर्सी रखी, पिता को धूप में बैठाया और माँ के हाथ की चाय पी।
उस दिन उसने खुद से कहा—
“घर छोड़ना आसान था, पर घर से दूर रहकर जीना सबसे मुश्किल।”
रविन्द्र जान चुका था—दुनिया की कोई भी ऊँचाई उस आँगन से बड़ी नहीं, जहाँ किसी ने बिना शर्त उसे अपना कहा था।

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Rajeev Verma

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