आशु आठ साल का था। उसका सपना था—दौड़ में सबसे तेज़ बनना। वह रोज़ स्कूल के मैदान में बच्चों को तेज़ दौड़ते देखता और सोचता,
“एक दिन मैं भी सबसे आगे रहूँगा।”
लेकिन सच यह था कि आशु जल्दी थक जाता था। पहली ही दौड़ में वह पीछे रह जाता। कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते,
“तू तो कछुए जैसा दौड़ता है!”
आशु उदास हो जाता, पर हार नहीं मानता। उसने अपने पापा से कहा,
“मुझे तेज़ बनना है।”
पापा मुस्कराए,
“लक्ष्य चाहे छोटा हो या बड़ा, उसे पाने के लिए निरंतर प्रयास, सही मेहनत और धैर्य चाहिए।”
अगले दिन से आशु ने नई शुरुआत की। वह रोज़ सुबह जल्दी उठता। पहले धीरे-धीरे दौड़ता, फिर थोड़ा तेज़। कुछ दिन तो उसके पैर दुखते, साँस फूलती, पर वह रुकता नहीं।
पापा उसे समझाते,
“ताकत सिर्फ शरीर में नहीं, मन में भी होती है। खुद पर भरोसा रखो।”
आशु ने अपने कमरे में एक काग़ज़ चिपका दिया—
“मैं तेज़ बन सकता हूँ।”
हर दिन वह उस लाइन को पढ़ता और दौड़ने चला जाता। बारिश हो या धूप, वह मैदान पहुँचता। कभी वह खुद से कहता,
“आज कल से एक कदम ज़्यादा दौड़ूँगा।”
महीने बीत गए। उसके कदम मजबूत होने लगे, साँस लंबी होने लगी। मज़ाक उड़ाने वाले बच्चे अब उसे ध्यान से देखने लगे।
स्कूल की स्पोर्ट्स डे आई। सौ मीटर की दौड़ थी। आशु का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे पुराने दिन याद आए—हार, मज़ाक, थकान। फिर उसे पापा की बात याद आई—
“खुद को मजबूत बनाओ, तभी खुद पर भरोसा आएगा।”
सीटी बजी। सब दौड़े। आशु ने सिर्फ एक बात सोची—
“रुकना नहीं है।”
उसके पैर ज़मीन से बात कर रहे थे, साँस हवा से। वह आगे बढ़ता गया। आख़िरी मोड़ पर वह दूसरे नंबर पर था, पर उसने ताकत लगाई—शरीर की नहीं, मन की। और वह सबसे आगे निकल गया।
जब वह फिनिश लाइन पर पहुँचा, लोग तालियाँ बजा रहे थे। वही बच्चे जो हँसते थे, अब कह रहे थे,
“तू तो सच में तेज़ बन गया!”
आशु ने आसमान की ओर देखा और मुस्कराया। उसे समझ आ गया—लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता ताकत, मेहनत और धैर्य से बनता है। और जो खुद पर भरोसा करना सीख ले, वही दुनिया को प्रेरित करता है।