लघु कथा – 32

आरव चौदह साल का था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल सामान्य लड़का लगता—स्कूल जाता, दोस्तों से हँसता, क्रिकेट खेलता। लेकिन उसके भीतर एक ऐसी दुनिया थी जहाँ सोच कभी रुकती ही नहीं थी।
पिछले साल एक घटना ने उसे बदल दिया था। स्कूल से लौटते समय उसका एक्सीडेंट होते-होते बचा था। बाइक तेज़ थी, ब्रेक फिसल गया था, और आरव बस कुछ इंच से बचा था। उसके बाद से उसका दिमाग हर समय चौकन्ना रहने लगा।
अब वह हर बात पर सोचने लगता—
“अगर मैं गलत बोल दूँ तो?”
“अगर टीचर मुझसे सवाल पूछ लें और मुझे न आए तो?”
“अगर दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाएँ तो?”
रात को बिस्तर पर लेटते ही उसका दिमाग फिल्म की तरह पुरानी बातें चलाने लगता। वह सोचता—
“काश उस दिन मैं सड़क जल्दी पार न करता।”
“काश मैं थोड़ा और सावधान होता।”
वह बार-बार उसी घटना को याद करता, जैसे दिमाग उसे भूलने ही नहीं देना चाहता।
यह था उसका रूमिनेशन—बीते हुए डर को बार-बार जीना।
दिन में भी उसका दिमाग शांत नहीं रहता। वह भविष्य की चिंताओं में खोया रहता—
“अगर कल टेस्ट में खराब नंबर आ गए तो?”
“अगर मम्मी-पापा नाराज़ हो गए तो?”
“अगर मेरे साथ फिर कुछ बुरा हो गया तो?”
यह था उसका वॉरिंग—आने वाले कल से डरना।
धीरे-धीरे आरव चिड़चिड़ा होने लगा। छोटे फैसले भी उसे परेशान करने लगे—कौन सी पेंसिल लूँ, कौन सी कॉपी, किस दोस्त के साथ बैठूँ। उसका मन हर पल खतरा ढूँढता रहता, जैसे दिमाग अब भी उसे बचाने की कोशिश कर रहा हो।
एक दिन उसकी टीचर ने नोटिस किया कि वह चुप रहने लगा है। उन्होंने उसे बुलाया और प्यार से पूछा,
“आरव, तुम इतने खोए-खोए क्यों रहते हो?”
पहले तो वह चुप रहा, फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सब बता दिया—एक्सीडेंट, डर, रातों की नींद, लगातार सोचते रहना।
टीचर ने कहा,
“तुम्हारा दिमाग तुम्हें सुरक्षित रखना चाहता है। लेकिन कभी-कभी वह ज़रूरत से ज़्यादा चौकन्ना हो जाता है। इसे ही ट्रॉमा कहते हैं।”
उन्होंने उसे एक तरीका सिखाया।
“जब भी दिमाग बहुत सोचने लगे, अपने आसपास पाँच चीज़ें देखो, चार चीज़ें छुओ, तीन आवाज़ें सुनो। इससे दिमाग वर्तमान में लौट आता है।”
आरव ने कोशिश शुरू की। जब भी सोच का तूफ़ान आता, वह खिड़की से बाहर देखता, पेड़ गिनता, पंखे की आवाज़ सुनता, किताब छूता। धीरे-धीरे उसका मन वापस ‘अभी’ में आने लगा।
उसने डायरी लिखना भी शुरू किया—जो बीत गया, उसे काग़ज़ पर छोड़ देना; जो आने वाला है, उसे भरोसे पर छोड़ देना।
एक दिन उसने खुद से कहा,
“मैं डर नहीं हूँ। मैं वो हूँ जो डर के बावजूद आगे बढ़ रहा है।”
समय के साथ उसकी सोच धीमी होने लगी। वह समझ गया—सोचना ज़रूरी है, पर जब सोच ही ज़िंदगी रोक दे, तब उसे थामना सीखना पड़ता है।
आरव अब जानता था—घाव शरीर पर ही नहीं, दिमाग पर भी लगते हैं। और जैसे शरीर भरता है, वैसे ही मन भी भर सकता है—थोड़े धैर्य, थोड़ी समझ और थोड़े प्यार से।

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Rajeev Verma

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