दिनेश एक साधारण, लेकिन बहुत समझदार आदमी था। उसने ज़िंदगी किताबों से कम और अनुभवों से ज़्यादा सीखी थी। उसका बेटा राजेश पढ़ाई में ठीक था, पर उसे हर बात पर बोलने की आदत थी। चाहे किसी को पूरी बात कहनी हो या नहीं, राजेश बीच में बोल पड़ता।
एक शाम राजेश दोस्तों से बहस करके घर आया। गुस्से में बोला,
“पापा, सब लोग गलत हैं, बस मैं ही सही हूँ।”
दिनेश मुस्कराया और बोला,
“अच्छा, तो ज़रा बैठ और मुझे पूरी बात सुनने दे।”
राजेश बोलता गया, दिनेश चुपचाप सुनता रहा। जब राजेश थक गया, तब दिनेश ने पूछा,
“अब बताओ, तुमने दूसरों की पूरी बात कितनी सुनी?”
राजेश चुप हो गया।
दिनेश ने कहा,
“बेटा, थोड़ा पढ़ना, ज़्यादा सोचना, कम बोलना और ज़्यादा सुनना — यही बुद्धिमान बनने के उपाय हैं।”
अगले दिन दिनेश ने राजेश को अपने साथ बाज़ार ले गया। एक दुकानदार और ग्राहक में बहस हो रही थी। राजेश तुरंत बोलने लगा, पर दिनेश ने इशारे से उसे रोक दिया। कुछ देर सुनने के बाद राजेश खुद समझ गया कि गलती दोनों की थी, सिर्फ एक की नहीं।
घर लौटते समय राजेश बोला,
“पापा, अगर मैं शुरू में बोल पड़ता तो शायद गलत समझ लेता।”
दिनेश मुस्कराया,
“यही तो सीख है। जो ज़्यादा सुनता है, वह ज़्यादा समझता है।”
दिनेश ने राजेश को एक किताब दी और कहा,
“इसे रोज़ थोड़ा पढ़ना, फिर उस पर सोचना। हर बात पर तुरंत मत बोलना।”
कुछ दिनों बाद राजेश में बदलाव दिखने लगा। वह पहले सुनता, फिर सोचता, फिर बोलता। दोस्त भी कहने लगे,
“अब तू ज़्यादा समझदार लगने लगा है।”
एक दिन वही दोस्त फिर बहस करने लगे। इस बार राजेश चुप रहा, सबकी बात सुनी और फिर शांति से बोला। सब मान गए।
घर आकर उसने दिनेश से कहा,
“पापा, आज समझ आया — बुद्धिमानी आवाज़ में नहीं, समझ में होती है।”
दिनेश ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा,
“जो सुनना सीख गया, उसने सीखने की आधी मंज़िल तय कर ली।”