रवि और मोहन बचपन के दोस्त थे। एक ही गली में पले, एक ही स्कूल में पढ़े, पर जैसे-जैसे बड़े हुए, उनकी सोच अलग दिशाओं में उड़ने लगी—बिलकुल मधुमक्खी और मक्खी की तरह।
रवि को किताबें, नए विचार और मेहनत से कुछ बनाने का शौक था। उसे फूलों की तरह सुंदर अवसर दिखते थे—सीखने के मौके, आगे बढ़ने के रास्ते। वह कहता,
“ज़िंदगी में कुछ ऐसा करना है, जिससे खुद पर गर्व हो।”
मोहन को मज़ा, तात्कालिक सुख और आसान रास्ते पसंद थे। उसे वहीं जाना अच्छा लगता, जहाँ भीड़ हो, शोर हो, और बिना मेहनत के मज़ा मिल जाए। वह कहता,
“ज़िंदगी है यार, इतना सोच-वोच कर क्या करना!”
कॉलेज के बाद रवि एक छोटे से शहर में नौकरी करने लगा और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। मोहन शहर में ही रह गया, दोस्तों के साथ समय बिताता, काम बदलता, पर कहीं टिकता नहीं।
रवि हर बार मोहन को समझाने की कोशिश करता,
“यार, कुछ तय कर, मेहनत कर, कल को पछताएगा।”
मोहन हँस देता,
“तू बहुत सीरियस है, ज़िंदगी एन्जॉय कर।”
एक दिन रवि ने मोहन को अपने ऑफिस बुलाया। साफ-सुथरा माहौल, काम में लगे लोग, सब कुछ एक मकसद के साथ। मोहन बोला,
“इतनी शांति में बोरियत नहीं होती?”
रवि मुस्कराया,
“यही शांति मुझे ताकत देती है।”
कुछ महीनों बाद मोहन को पैसों की ज़रूरत पड़ी। वह रवि के पास आया। रवि ने मदद की, पर फिर समझाने लगा। इस बार मोहन चिढ़ गया,
“तू हमेशा उपदेश क्यों देता है? हर कोई तेरी तरह नहीं बन सकता।”
उस रात रवि बहुत सोचता रहा। उसे समझ आ गया कि वह बार-बार अपनी ऊर्जा उस दोस्त को बदलने में लगा रहा है, जो बदलना ही नहीं चाहता।
अगले दिन रवि ने बस इतना कहा,
“मोहन, मैं तुझे दोस्त मानता हूँ, पर मैं अब तुझे वही बनने को नहीं कहूँगा जो तू बनना नहीं चाहता।”
वक़्त बीता। रवि मेहनत से आगे बढ़ता गया। उसके सपनों का शहद धीरे-धीरे बनने लगा। मोहन वहीं रहा—भीड़ में, शोर में, अस्थायी खुशियों में।
एक दिन मोहन ने रवि से कहा,
“शायद तू सही था।”
रवि बोला,
“मैं सही नहीं था, मोहन। बस मेरी राह अलग थी, तेरी अलग।”
रवि जान चुका था—मधुमक्खी फूल ढूँढती है, मक्खी गंदगी। दोनों बुरी नहीं, बस अलग हैं। और किसी को उसकी प्रकृति से अलग उड़ने को मजबूर करना, अपनी ताकत खो देना है।