लघु कथा-3

बाबूलाल की आत्मा आज बहुत खुश थी। नहीं, इसलिए नहीं कि उसे मोक्ष मिल गया था, बल्कि इसलिए कि उसके बच्चों ने आज बड़ा शानदार ड्रामा किया था। वह ऊपर बैठकर बादलों की रेलिंग से झांक रहा था और ठहाके मार-मार कर हँस रहा था।
“वाह रे मेरे बच्चों!” बाबूलाल बोला, “जिंदा रहते तो मुझे दाल-रोटी में भी मोलभाव करवाते थे, और आज पंडित जी को बुलाकर पूरी-पकवान की दावत उड़ा रहे हैं।”
नीचे घर में बड़ा माहौल बना हुआ था। फूल-मालाएँ, धूपबत्ती, अगरबत्ती, मिठाइयों की खुशबू और पंडित जी का भारी-भरकम स्वर—“स्वाहा… स्वाहा…”। बाबूलाल की आत्मा ने गर्दन खुजाई और बोला, “अरे भाई, जब मैं था तब तो मुझे खांसने पर भी ‘शोर मत करो’ कह देते थे।”
रसोई में उसके तीनों बच्चे दौड़-भाग कर रहे थे। बड़ा बेटा बोला, “पापा को खीर बहुत पसंद थी।”
दूसरा बोला, “नहीं-नहीं, उन्हें हलवा ज्यादा अच्छा लगता था।”
तीसरा बोला, “जो भी बनाओ, बस ज्यादा बनाओ, पंडित जी भूखे न रह जाएँ।”
बाबूलाल ने ऊपर से देखा और हँसते हुए कहा, “वाह! जब मैं जिंदा था तब बोलते थे—‘इतना मत खाओ, डॉक्टर ने मना किया है।’ और आज… आज तो पेट की नहीं, पंडित जी की चिंता है।”
इतना ही नहीं, बच्चों ने कुत्ते और कौवे को भी बुला लिया था। मोहल्ले का कुत्ता पूड़ी खा रहा था और कौवा खीर में चोंच मार रहा था। बाबूलाल बोला, “अरे वाह! इनको भी दावत, और मुझे? मुझे तो जिंदा रहते घर में जगह नहीं मिली थी, इसलिए वृद्धाश्रम भेज दिया था।”
उसे वो दिन याद आया जब बच्चों ने कहा था, “पापा, वहां आपकी अच्छी देखभाल होगी।” और वहां उसकी देखभाल बस दवाई और चुप्पी से होती थी।
अब नीचे देखो—उसका फोटो भगवान के पास लगाया गया था। फोटो को माला पहनाई गई थी, जैसे वो कोई बड़ा संत हो। बाबूलाल बोला, “जब मैं घर में था, तब तो मेरी फोटो भी दीवार से उतार दी थी—कहते थे जगह कम है। आज भगवान के बगल में जगह मिल गई!”
पंडित जी को पांच सौ का नोट, मिठाई का डिब्बा और नए कपड़े दिए जा रहे थे। सब बोल रहे थे, “ये सब पिताजी के नाम से है।” बाबूलाल ने सिर पकड़ लिया—“मेरे नाम से? जब मैं जिंदा था तब पचास रुपये भी मांगने पर कहते थे—‘बुढ़ापे में क्या खर्च करोगे?’”
उसे समझ आ गया कि ये सब क्यों हो रहा है। बच्चे आपस में धीरे-धीरे बोल रहे थे, “कहीं पापा का भूत न आ जाए।”
दूसरा बोला, “हाँ, सुना है जिनकी सेवा नहीं होती, वो भूत बनकर सताते हैं।”
तीसरा बोला, “इसलिए सब सही से कर लो।”
बाबूलाल जोर से हँसा, “अरे मूर्खों! मैं भूत बनकर नहीं आता, तुम खुद अपने ज़मीर से डर रहे हो।”
फिर उसने आसमान से सब बच्चों को एक ही बात भेजी—
“मुझे पकवान नहीं चाहिए थे, पैसे नहीं चाहिए थे। बस थोड़ी सी जगह, थोड़ा सा समय और थोड़ा सा प्यार चाहिए था। ये सब मरने के बाद नहीं, जीते जी चाहिए होता है।”

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Rajeev Verma

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