आरव और सिया की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। लाइब्रेरी में एक ही किताब के लिए दोनों के हाथ एक साथ बढ़े थे, और वहीं से उनकी कहानी शुरू हुई। डेटिंग के दिनों में वे घंटों कैंपस में घूमते, चाय की छोटी-सी दुकान पर बैठकर सपनों की बातें करते और बारिश में बिना छाते भीगते हुए हँसते रहते।
शादी के बाद ज़िंदगी तेज़ हो गई। ऑफिस, मीटिंग, ट्रैफिक और थकान—सब कुछ उनके बीच आ गया। प्यार था, लेकिन वक़्त कम हो गया था। बातें ज़रूरी बातों तक सिमट गईं—बिल, काम, नींद।
एक शाम सिया ने महसूस किया कि कई दिनों से वे कहीं साथ बाहर नहीं गए। उसने आरव से कहा,
“हम दोनों एक साथ होते हैं, लेकिन साथ नहीं होते।”
आरव ने उसकी बात को गंभीरता से लिया। उसने तय किया कि अब वह सिर्फ साथ रहने नहीं, बल्कि “साथ जीने” की कोशिश करेगा।
अगले रविवार उसने सिया को बिना बताए तैयार होने को कहा। वे उसी पुरानी चाय की दुकान पर गए जहाँ पहली बार बैठे थे। वही मेज़, वही खिड़की, बस वक़्त बदल गया था। सिया की आँखों में चमक लौट आई। उन्होंने पुराने किस्से याद किए, हँसे, और महसूस किया कि प्यार को ज़िंदा रखने के लिए वक़्त देना पड़ता है।
आरव ने एक नई आदत शुरू की। कभी सिया के बैग में छोटा सा नोट रख देता—
“आज भी तुम मेरी सबसे प्यारी आदत हो।”
कभी तकिए के नीचे—
“सपनों में भी मुस्कराती रहना।”
सिया भी पीछे नहीं रही। वह सुबह आरव के उठने से पहले उसकी पसंद की कॉफी बना देती। कभी ऑफिस जाते समय उसकी जेब में उसका पसंदीदा चॉकलेट रख देती। छोटी-छोटी चीज़ों में वे फिर से एक-दूसरे को ढूँढने लगे।
वे हर हफ्ते एक दिन सिर्फ अपने लिए रखने लगे—कभी मूवी डेट, कभी पार्क में टहलना, कभी यूँ ही स्कूटर पर शहर घूम आना। वे वही सब करने लगे जो कभी डेटिंग के दिनों में किया करते थे।
धीरे-धीरे एकरसता टूटने लगी। अब उनके पास सिर्फ जिम्मेदारियाँ नहीं, बल्कि यादें भी बनने लगीं। वे एक-दूसरे को फिर से जानने लगे—नए सपने, नए डर, नई चाहतें।
एक रात सिया ने आरव से कहा,
“प्यार बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, इन छोटे पलों से बनता है।”
आरव ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“और इन पलों को बनाने के लिए सबसे ज़रूरी है—वक़्त देना।”
उस दिन दोनों ने समझा कि गुणवत्तापूर्ण समय सिर्फ साथ बैठना नहीं, बल्कि दिल से साथ होना है। जब दो लोग जानबूझकर एक-दूसरे के लिए वक़्त निकालते हैं, तो प्यार हर दिन नया हो जाता है—बिलकुल उनकी कहानी की तरह।