लघु कथा – 27

अनु की सबसे बड़ी शिकायत झगड़ों से नहीं थी, बल्कि उस खामोशी से थी जो धीरे-धीरे उसके घर में बस गई थी। पहले वह और रोहन घंटों बात करते थे—दिन कैसा गया, क्या अच्छा लगा, क्या बुरा। अब रोहन घर आते ही फोन में खो जाता। उसकी उँगलियाँ किसी और के नाम पर चलती रहतीं, और अनु सामने बैठी होती, फिर भी जैसे मौजूद ही न हो।
एक दिन अनु ने धीरे से कहा,
“रोहन, तुम मुझसे कुछ शेयर क्यों नहीं करते अब?”
रोहन चिढ़ गया, “हर बात बताना ज़रूरी नहीं होता। तुम बेवजह परेशान हो जाती हो।”
अनु को लगा, जैसे उसकी भावनाओं को कोई नाम ही नहीं दिया जा रहा—बस “चिढ़चिढ़ापन” कहकर टाल दिया जाता है। उसने देखा, रोहन किसी और से खुलकर हँसता है, उसी से अपने ऑफिस की परेशानियाँ, अपने डर, अपने सपने शेयर करता है। जो बातें कभी अनु के लिए होती थीं, अब किसी और की हो चुकी थीं।
रातें बदल गई थीं। पहले जिन पलों में पास होने का सुख था, अब वहाँ दूरी थी। पास होकर भी दूर। न वैसी चाह, न वैसा अपनापन। अनु को लगता, जैसे उसका शरीर ही नहीं, उसका मन भी अकेला हो गया है।
रोहन ने अपने फोन और लैपटॉप का पासवर्ड बदल दिया। अनु ने जब पूछा, तो वह हँसकर बोला,
“तुम्हें शक करने की आदत हो गई है।”
लेकिन अनु को शक नहीं, खालीपन महसूस होता था। वह देखती थी—चैटिंग बढ़ती जा रही है, पर उससे बातचीत घटती जा रही है।
एक दिन अनु ने हिम्मत करके कहा,
“तुम किसी और से अपने और मेरे झगड़ों की बातें क्यों करते हो? मुझसे क्यों नहीं?”
रोहन ने उल्टा उसे ही दोषी बना दिया,
“अगर तुम इतनी नेगेटिव न होती, तो मुझे बाहर बात करने की ज़रूरत ही न पड़ती।”
हर तुलना उसे तोड़ देती थी—
“वो मुझे समझती है, तुम नहीं।”
“वो कभी चिड़चिड़ी नहीं होती, तुम हर बात पर रो देती हो।”
अनु सोचती—क्या प्यार का मतलब किसी और जैसा बन जाना है?
धीरे-धीरे रोहन उससे और दूर होने लगा। वह उस “दूसरे व्यक्ति” से मिलकर लौटता और अनु से बात तक नहीं करता। बड़े फैसलों में भी अनु की राय नहीं ली जाती। झगड़े सुलझाने की कोई कोशिश नहीं, बस टालना, चुप रहना, भाग जाना।
एक रात अनु ने कहा,
“रोहन, तुम्हारे आने से पहले और बाद में मैं दो अलग इंसान हो गई हूँ।”
रोहन ने जवाब नहीं दिया। वह फोन में ही उलझा रहा।
तब अनु ने पहली बार अपने दिल की सुनी। उसने समझा—रिश्ते झगड़ों से नहीं टूटते, वे खामोशी से टूटते हैं। जब भावनाएँ बाहर किसी और के पास चली जाएँ, और अपना घर सिर्फ आदत बनकर रह जाए।
अनु ने उस रात तय किया—वह भी अब खुद से बात करेगी, खुद को सुनेगी। क्योंकि जहाँ प्यार नहीं सुना जाता, वहाँ रहकर खुद को खो देना सबसे बड़ा दुख होता

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Rajeev Verma

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