लघु कथा – 26

गांव के आख़िरी छोर पर मिट्टी और टीन से बना एक छोटा सा घर था। उसी घर में रहता था रामु—एक साधारण मजदूर, जिसके हाथों की लकीरों में पसीना और जीवन की सच्चाई दोनों बसते थे। सुबह की पहली अज़ान से पहले ही वह उठ जाता, पत्नी सविता के बनाए सूखे चावल या बासी रोटी खाकर काम पर निकल जाता। उसका काम था ईंट भट्ठे पर—जहाँ धूप आग बनकर गिरती थी और मिट्टी इंसान की साँसों में घुल जाती थी।
रामु जानता था कि उसका शरीर जल्दी थक जाता है, पर मन कभी थकने की इजाज़त नहीं देता। उसके दो बच्चे थे—मोहन और गीता। वह चाहता था कि वे कभी भट्ठे की आग न देखें, कभी अपने हाथों से ईंटें न ढोएँ। वह चाहता था कि उनके हाथों में किताबें हों, उनके सपनों में उजाला हो।
दिनभर ईंटें ढोते-ढोते उसकी कमर झुक जाती, हथेलियाँ फट जातीं, पर वह कभी शिकायत नहीं करता। शाम को जब दूसरे मजदूर काम छोड़ देते, वह अक्सर थोड़ा और रुक जाता—कुछ पैसे ज़्यादा मिल जाएँ, तो बच्चों के लिए दूध या नई कॉपी ला सके।
जब वह घर पहुँचता, तब तक अंधेरा उतर चुका होता। सविता दरवाज़े पर उसकी राह देखती रहती। रोटियाँ कब की बन चुकी होतीं, लेकिन रामु के लौटने तक वे ठंडी हो जातीं। वह मुस्कराकर कहता,
“मेरे हिस्से में तो हमेशा ठंडी रोटियाँ ही आती हैं।”
सविता की आँखें भर आतीं, पर वह कुछ नहीं कहती।
एक दिन मोहन ने मासूमियत से पूछा,
“बाबा, आप जल्दी क्यों नहीं आते? हम आपके साथ गरम रोटी खाना चाहते हैं।”
रामु ने उसे गोद में उठाकर कहा,
“बेटा, अगर मैं जल्दी आ जाऊँ, तो तुम्हारी किताबें, तुम्हारे जूते और तुम्हारे सपने कैसे आएँगे?”
उस रात रामु देर तक सो नहीं पाया। उसे लगा, जैसे उसकी जिंदगी सिर्फ दूसरों के लिए जलने वाली दीया बन चुकी है। पर उसी क्षण उसके मन में एक और विचार जागा—शायद यही उसकी साधना है। जैसे साधु जंगल में तप करते हैं, वैसे ही वह संसार में रहकर तप कर रहा है। बिना मंत्र, बिना पूजा—सिर्फ कर्म।
एक दिन भट्ठे पर एक बूढ़ा मजदूर बीमार पड़ गया। सब लोग काम छोड़कर अलग हो गए, पर रामु ने उसे पानी पिलाया, छाया में बैठाया और उसका काम भी खुद कर दिया। किसी ने पूछा,
“रामु, तुझे क्या मिलेगा इससे?”
रामु ने कहा,
“मुझे कुछ नहीं चाहिए। शायद बस मन की शांति।”
उस शाम जब वह घर पहुँचा, तो सविता ने रोटियाँ फिर गरम कर दी थीं। रामु ने पहली बार गरम रोटी खाई, लेकिन उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा,
“आज रोटियाँ गरम हैं, पर मेरा मन तो बरसों से ठंडी रोटियों में ही तप कर मजबूत हो गया है।”
समय बीतता गया। बच्चे बड़े होने लगे। मोहन स्कूल में अच्छा करने लगा, गीता कविता लिखने लगी। एक दिन गीता ने अपनी कॉपी में लिखा—
“मेरे पिता ठंडी रोटियाँ खाते हैं, ताकि मेरे सपने गरम रह सकें।”
रामु ने जब यह पढ़ा, तो उसे लगा, उसकी सारी तपस्या सफल हो गई। उसे समझ आ गया कि ठंडी रोटियाँ कोई अभाव नहीं, बल्कि त्याग की मुहर हैं। जो दूसरों के लिए अपने हिस्से की गरमी छोड़ देता है, वही सच में जीवन की आग को अर्थ देता है।
रामु अब जान चुका था—उसकी जिंदगी कोई साधारण मजदूर की कहानी नहीं, बल्कि एक मौन साधक की यात्रा है, जो हर दिन कर्म के रास्ते ईश्वर तक पहुँचता है।

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Rajeev Verma

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