लघु कथा – 23

अखिल अपनी छोटी सी टेबल पर बैठा था। कमरा सुनसान था। बाहर बारिश की हल्की बूँदें खिड़की पर गिर रही थीं, और उसका मन भीतर से और भी भारी महसूस कर रहा था। वह गहरे उदासी और आत्म-शंका में डूबा हुआ था। अखिल ने कल ही अपने पिता की आँखों में असंतोष देखा था, और आज उसने फैसला किया—जो मन में है, वह शब्दों में उतारेगा।
उसने कागज़ और कलम निकाले और लिखा:


“पापा,
मैं जानता हूँ कि आप मुझसे बहुत उम्मीदें रखते थे। मैंने हमेशा कोशिश की, लेकिन लगता है कि मैं वह नहीं बन पाया जो आप चाहते थे। मेरे अंदर वो दृढ़ता, वो सफलता, वो अनुशासन शायद नहीं था जो आप चाहते थे। और शायद इसी कारण मैं आज इस कागज़ पर अपनी भावनाएँ लिख रहा हूँ।
मुझे डर है कि आप निराश होंगे। मुझे डर है कि आप सोचेंगे—‘अखिल ने मेरे विश्वास को नहीं निभाया’। पापा, मैं जानता हूँ कि आप हमेशा चाहते थे कि मैं बेहतर बनूँ, कि मैं आपके सपनों को जीऊँ। लेकिन अब लगता है कि मैं वह नहीं बन पाया।
कभी-कभी मैं खुद से भी सवाल करता हूँ—क्या मैं आपके और खुद के मानकों पर खरा उतरा? क्या मैं वह बेटा बन पाया जो आप गर्व से अपने मित्रों और रिश्तेदारों के सामने पेश कर सकें? मेरे अंदर बहुत कुछ है, लेकिन लगता है कि वह पर्याप्त नहीं है।
पापा, शायद आपको मेरे इस पत्र से गहरा दुख होगा, लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप जानें—मैं हर दिन कोशिश करता रहा। हर असफलता के बाद उठता रहा, हर गलती से सीखने की कोशिश की, पर फिर भी लगता है कि मैं आपके लिए, और खुद के लिए भी, पर्याप्त नहीं हूँ।
मैं जानता हूँ कि आप मुझसे बेहतर के हकदार थे। और शायद यही कारण है कि मैं खुद को इतना छोटा महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि आप हमेशा मेरे लिए सोचते हैं, मेरे भविष्य के बारे में चिंता करते हैं। शायद आज आपको यह पत्र पढ़कर लगे कि मैं असफल हूँ, लेकिन पापा, मेरे अंदर वह प्यार और सम्मान हमेशा रहा है जो आपको चाहिए।
मुझे सिर्फ यह डर है कि मैंने आपकी उम्मीदों को पूरा नहीं किया। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे समझें। मैं अपनी सीमाओं को जानता हूँ, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि आप हमेशा मेरे लिए वहाँ रहे हैं। मेरी असफलताओं के बावजूद, आपका प्यार और विश्वास मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत है।
पापा, यह पत्र सिर्फ मेरी भावनाओं का इज़हार है। मैं जानता हूँ कि मैं गलतियाँ करता हूँ, और मैं हमेशा आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता। लेकिन मैं हर दिन कोशिश करूँगा—खुद को बेहतर बनाने की, आपके विश्वास के योग्य बनने की।
आपका बेटा,
अखिल”


पत्र लिखते हुए अखिल की आँखों से आँसू टपकने लगे। उसने उसे लिफाफे में रखा और पिता के कमरे के पास रख दिया। वह जानता था कि यह पत्र केवल शब्दों का नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का इज़हार था।
अखिल की उम्मीद थी कि पिता यह पत्र पढ़कर समझेंगे—कि वह चाहे कितना भी कमजोर या असफल दिखे, उसके भीतर उनकी उम्मीदों का सम्मान और प्यार हमेशा जीवित है। और शायद, यही शब्द उसके और पिता के बीच की दूरी को कम कर सकेंगे।

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Rajeev Verma

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