लघु कथा – 21

अमर और नंदिनी की शादी को दस साल हो चुके थे। शुरुआत में सब कुछ सुंदर था—प्यार, हँसी, एक-दूसरे के लिए समझ और सहयोग। उनके जीवन में संतुलन था, और घर उनके लिए सुकून का ठिकाना था।
लेकिन समय के साथ चीजें बदलने लगीं। छोटे-छोटे बहसों की शुरुआत हुई—पहले खाना, फिर बच्चों की पढ़ाई, फिर परिवार और दोस्तों के मामले। कभी अमर की बातें नंदिनी को चुभतीं, कभी नंदिनी की नर्म टिप्पणियाँ अमर के दिल में चोट कर देतीं।
“तुम हमेशा अपने काम में व्यस्त रहते हो! क्या मुझे तुम्हारे साथ अकेले समय बिताने का कोई अधिकार नहीं?” नंदिनी ने एक दिन गुस्से में कहा।
अमर ने चुप रहकर जवाब दिया, “मैं मेहनत कर रहा हूँ ताकि हमारा घर चले, तुम्हें और बच्चों को सब मिले।”
लेकिन वह जवाब किसी को संतुष्ट नहीं कर पाया। बातचीत धीरे-धीरे बहस में बदल गई। हर छोटी बात पर आरोप, हर शब्द पर कटुता। प्यार की जगह तनाव, स्नेह की जगह ताने, और सुरक्षा की जगह डर आ गया।
एक शाम, नंदिनी और अमर फिर बहस कर रहे थे। बच्चों के कमरे में हल्की-हल्की हँसी सुनाई दे रही थी। अमर ने गहरी सांस ली और खुद से कहा,
“यह घर अब हमारे लिए सुकून का स्रोत नहीं रहा। यह हमारा तनाव, हमारी चोट बन गया है। सिर्फ शादी बचाना ही सब कुछ नहीं हो सकता—खुद को बचाना भी उतना ही जरूरी है।”
अमर ने शांत होकर नंदिनी से कहा,
“नंदिनी, मुझे लगता है कि हम दोनों अब अपने गुस्से और अपेक्षाओं में फंस गए हैं। यह रिश्ता प्यार और सुकून देने के लिए बना था। अगर अब यह दर्द और अपमान का कारण बन रहा है, तो हमें खुद के लिए भी सोचना होगा।”
नंदिनी की आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से कहा,
“मैं जानती हूँ, हम दोनों प्यार करते थे… अभी भी करते हैं। लेकिन हमने खुद को और एक-दूसरे को चोट पहुँचाई है। शायद हमें कुछ समय अलग बिताना चाहिए, सोचने के लिए।”
दोनों ने फैसला किया कि कुछ समय के लिए अलग रहकर अपनी भावनाओं और जीवन के मूल्यों को समझेंगे। यह कोई तलाक या अलगाव नहीं था, बल्कि आत्म-प्रतिबिंब का समय था—अपने आप को जानने और समझने का।
कुछ हफ्तों बाद, दोनों ने देखा कि खुद को समझना और स्वीकारना कितना जरूरी था। अमर ने नंदिनी की अच्छाइयों और कमजोरियों को नए नजरिए से देखा। नंदिनी ने भी अमर की मेहनत और धैर्य की कद्र की।
इस छोटे से समय ने उन्हें यह सिखाया कि प्यार और रिश्ते केवल शादी में बँधकर नहीं टिकते। यह समझ, सम्मान और सुकून में टिकते हैं। और कभी-कभी, खुद को बचाना और सीमाएँ तय करना भी उतना ही जरूरी होता है जितना रिश्ते को बचाना।
अमर और नंदिनी ने धीरे-धीरे फिर साथ आने का निर्णय लिया—लेकिन अब बातचीत और प्यार के नए नियमों के साथ। उन्होंने जाना कि जो रिश्ता प्यार, सुकून और सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, अगर वही दर्द और अपमान का कारण बन जाए, तो सिर्फ शादी बचाना ही पर्याप्त नहीं—खुद को बचाना भी उतना ही जरूरी है।
और इस समझ ने उनका रिश्ता पहले से ज्यादा मजबूत और स्थिर बना दिया।

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Rajeev Verma

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