लघु कथा – 20

गाँव के छोटे से मोहल्ले में पंडित रमेश का आश्रम था। वे सरल जीवन जीते थे, अपने कर्मों के लिए आदरित थे। लोग दूर-दूर से उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे। उसी मोहल्ले में मोहन नाम का युवक रहता था। गरीबी और कठिनाइयों ने उसे चोरी करने पर मजबूर कर दिया था। लोग उसे चोर कहते थे, लेकिन मोहन जानता था—यह उसकी कमजोरी थी, उसकी मजबूरी नहीं।
एक रात मोहन ने तय किया कि वह आश्रम से चंदाने की चीज़ चुरा लेगा। उसने चुपचाप आश्रम में घुसने की कोशिश की, पर जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, पंडित रमेश ने उसे पकड़ लिया।
“तुम यहाँ क्यों आए हो, बेटा?” पंडित ने शांत लेकिन सख्त स्वर में पूछा।
मोहन डर और शर्म के मारे कांप उठा। उसने झूठ बोलने की कोशिश की,
“मैं… मैं कुछ देख रहा था, कुछ नहीं।”
लेकिन पंडित रमेश ने उसकी आँखों में देखा और उसकी झूठ की कोशिश को चुपचाप नकार दिया।
“मोहन, सच बोलो। क्या तुम चोरी करने आए थे?”
मोहन की आँखों में आँसू थे। “हाँ, पंडित जी… मैं चोरी करने आया था, पर… मुझे लगता था कि कोई रास्ता नहीं है।”
पंडित रमेश ने गहरी साँस ली।
“मोहन, सुनो। तुम्हारा वंश, तुम्हारा परिवार, या हालात तुम्हारा मूल्य तय नहीं करते। ‘कर्मों से उद्धार, वंश से नहीं’। आज तुमने गलत सोचा, लेकिन अभी भी तुम्हारे पास विकल्प है।”
मोहन और भी डर गया। “पर पंडित जी, लोग मुझे हमेशा चोर कहते हैं। क्या मैं कभी सही इंसान बन पाऊँगा?”
पंडित ने गंभीर स्वर में कहा,
“जो इंसान अपने कर्म बदल लेता है, वही असली बदलाव करता है। तुम्हारे पुराने कर्म तुम्हें रोक नहीं सकते। लेकिन साहस चाहिए—ईमानदार होना और सही राह चुनना सबसे कठिन काम है।”
मोहन की आँखों में आँसू बहने लगे। पंडित ने उसके हाथ पकड़कर कहा,
“तुम्हारे पास अभी भी मौका है। और याद रखो—जो व्यक्ति दूसरों की बुराई सुनाता है, उसका असली चेहरा वही सामने आता है। कर्मों से ही उद्धार मिलता है, नाम या हालात से नहीं।”
मोहन ने अगले दिन अपने निर्णय को अमल में लाना शुरू किया। लेकिन मोहल्ले के लोग जानते थे कि वह चोरी करने वाला था। उसी शाम, मोहन गाँव के बाजार में पकड़ा गया। लोग जमा हो गए। उसकी निंदा और अपमान हुआ। मोहन का चेहरा लाल हो गया, दिल डर और शर्म से धक-धक कर रहा था।
तभी पंडित रमेश वहाँ पहुंचे। उन्होंने भीड़ को शांत किया।
“देखो, यह लड़का अपनी गलती समझ चुका है। तुम उसकी पिछली आदतों के बारे में सोचो, लेकिन उसकी भविष्य की राह पर विश्वास करो। कर्मों से उद्धार मिलता है, वंश या अपमान से नहीं।”
मोहन ने अपनी गलती स्वीकार की और प्रतिज्ञा की कि अब वह ईमानदार और मेहनती जीवन जिएगा। धीरे-धीरे उसने गाँव के बुजुर्गों की मदद करनी शुरू की, बच्चों को पढ़ाया, और जरूरतमंदों का सहारा बना।
कुछ महीनों बाद, वही लोग जिन्होंने उसकी निंदा की थी, अब उसकी तारीफ़ करने लगे। मोहन ने समझ लिया कि असली बदलाव केवल कर्मों से आता है, न कि नाम या हालात से।
एक दिन वह पंडित रमेश के पास आया और सिर झुकाया।
“आपकी शिक्षा ने मेरी ज़िंदगी बदल दी, पंडित जी। मैंने जाना कि सम्मान और उद्धार केवल मेरे कर्मों से आते हैं, किसी वंश या परिस्थितियों से नहीं।”
पंडित मुस्कुराए।
“याद रखो बेटा, कठिन परिस्थितियाँ सबको आज़माती हैं। पर सही कर्म चुनने का साहस ही इंसान को महान बनाता है।”
और उस दिन मोहन ने तय किया—अब उसके कर्म ही उसकी पहचान होंगे, और उसकी पुरानी आदतें केवल याद बनकर रह जाएँगी।

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Rajeev Verma

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