रमेश ने उस सुबह देर तक आईने में खुद को देखा। चेहरे पर झुर्रियाँ साफ दिख रही थीं, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आंखों में एक अजीब सी थकान थी। वह मन ही मन बोला, “ये सफ़र कब इतना लंबा हो गया, पता ही नहीं चला।” उसे आज भी लगता था कि वह अंदर से वही पुराना रमेश है, लेकिन आईना कुछ और ही कहानी सुना रहा था।
उसे अपना बचपन याद आया, जब वह माँ की उँगली पकड़कर स्कूल जाता था। तब उसे लगता था कि बड़ा होना बहुत मज़ेदार होगा। फिर वह जवान हुआ, नौकरी मिली, शादी हुई। जिम्मेदारियाँ आईं और सपने धीरे-धीरे पीछे छूटते चले गए। उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वह खुद कब इतना बदल गया।
पहले माँ-बाप की बातें मानता था, फिर पत्नी की। बाद में बच्चों की ज़रूरतें सबसे ऊपर हो गईं। उसने अपनी पसंद, अपनी थकान और अपने सपनों को हमेशा बाद में रखने की आदत बना ली। कभी सोचा भी नहीं कि उसकी बारी कब आएगी। वह हमेशा दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढता रहा।
आज उसके बच्चे बड़े हो चुके थे। बेटा उसे आराम करने की सलाह देता था, बेटी कहती थी कि ज़्यादा मेहनत मत किया करो। पोते-पोतियाँ उसे “नाना” और “दादू” कहकर बुलाते थे। ये शब्द सुनकर वह खुश भी होता था और थोड़ा चौंक भी जाता था। उसे अब भी याद था, जब कल तक लोग उसे “बेटा” कहकर बुलाते थे। समय कब पलट गया, उसे पता ही नहीं चला।
एक दिन वह पार्क में टहलने गया। पहले वह तेज़ चलता था, लेकिन अब कदम अपने आप धीमे हो जाते थे। घुटनों में हल्का सा दर्द रहने लगा था। वहीं एक बेंच पर बैठकर उसने पुराने दिनों को याद किया—दोस्तों के साथ हँसना, देर रात तक बातें करना, बेफिक्री से सपने देखना। आज उन दोस्तों में से कई दुनिया छोड़ चुके थे और कई अपने-अपने रास्तों में खो गए थे। उसे समझ नहीं आया कि कब सब बिखर गया।
शाम को वह घर लौटा तो पोती उसके पास दौड़कर आई और उसकी गोद में बैठ गई। उसने मुस्कराते हुए कहा, “दादू, कहानी सुनाओ।” रमेश ने उसे कहानी सुनानी शुरू की, लेकिन कहानी के बीच में उसकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई। उसे लगा जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी की कहानी सुना रहा हो। पोती ने उसके गाल पर हाथ रखा और बोली, “दादू, आप बहुत अच्छे हो।”
उस पल रमेश की आंखों में नमी आ गई। उसने महसूस किया कि ज़िंदगी ने उससे बहुत कुछ लिया—जवानी, ताकत, कई दोस्त—लेकिन बदले में उसे प्यार, परिवार और यादें भी दीं। उसने खुद से कहा कि शायद यही ज़िंदगी का हिसाब है।
रात को वह बिस्तर पर लेटा और सोचने लगा कि उसने हर किसी के लिए जीया, लेकिन अब वह अपने लिए भी जीना चाहता है। अब वह हर सुबह सूरज को ध्यान से देखेगा, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ समय बिताएगा और छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करेगा। उसने मन ही मन तय किया कि जब तक साँस है, वह ज़िंदगी को जी भर कर जिएगा, ताकि आख़िर में यह न कहना पड़े कि सब कुछ कब बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।