लघु कथा-19

मुंबई के एक पुराने मोहल्ले में दो परिवार रहते थे—शर्मा और वर्मा। शर्मा परिवार साधारण, मेहनती और शांत प्रकृति का था। पिता राजेश, माँ सीमा और उनका बेटा करण। वर्मा परिवार थोड़े दिखावे वाले और चर्चा में रहते थे—राकेश, लता और उनकी बेटी प्रिया। मोहल्ले के लोग अक्सर दोनों परिवारों के व्यवहार की तुलना करते रहते थे।
वर्मा परिवार की आदत थी—हर बात पर दूसरों की निंदा करना। नई दुकान खुली, बच्चों के कपड़े थोड़े अलग, पड़ोसी ने नया गार्डन बनाया—हर चीज़ उनकी आलोचना का विषय बन जाती थी। मोहल्ले में यह चर्चा बन गई थी कि वर्मा परिवार हमेशा सबकी निंदा करता रहता है।
एक दिन मोहल्ले में नया स्कूल खुला। वर्मा परिवार अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ चाय पर बैठा था। राकेश हंसते हुए बोला,
“शर्मा परिवार के बच्चे भी कमाल के हैं, सब आलसी और असंगठित। अगर हमारे बच्चे वैसे ही होते, तो हम शर्मिंदा होते।”
सीमा और राजेश ने यह सब सुना। राजेश ने अपनी पत्नी से कहा,
“देखो, सीमा। अब हमें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। बस सुनो। जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वह अपने आप को दिखा रहे होते हैं।”
करण ने यह सब ध्यान से सुना। उसके मन में उठ रही कई भावनाएँ शांत हो गईं। वह समझ गया कि आलोचना करने वाला केवल अपने भीतर की कमजोरी और डर दिखा रहा है।
कुछ हफ्ते बाद, स्कूल में आदित्य ने देखा कि कुछ बच्चे प्रिया की छोटी-छोटी गलतियों पर हँस रहे थे और उसके दोस्तों के सामने उसकी निंदा कर रहे थे। आदित्य का दिल टूटता, पर उसने पिता की सीख याद की। उसने अपने दोस्तों से पूछा,
“तुम सच में प्रिया को समझते हो या सिर्फ उसकी कमजोरियों को बढ़ा रहे हो?”
सभी चुप हो गए। आदित्य ने फिर कहा,
“जो दूसरों की निंदा करता है, वह अपने अंदर की कमजोरी दिखाता है। किसी की आलोचना करने से पहले खुद को देखो।”
यह बात उन बच्चों के लिए झकझोरने वाली थी। उन्होंने महसूस किया कि दूसरों के दोष ढूँढने में समय बर्बाद करना खुद पर ध्यान न देने जैसा है।
वहीं मोहल्ले में वर्मा परिवार की बेटी प्रिया धीरे-धीरे समझ गई कि उनका व्यवहार दूसरों के लिए कितना बोझिल है। उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, हम हमेशा दूसरों की निंदा क्यों करते हैं? क्या हम इससे खुश होते हैं?”
लता ने सिर झुकाया। “हमें लगता था कि दूसरों की बुराई दिखाने से हमारी अहमियत बढ़ेगी। अब लगता है, यह सिर्फ़ नकारात्मक ऊर्जा फैलाता है।”
एक शाम, मोहल्ले की चौपाल पर सभी लोग इकट्ठा हुए। राजेश ने शांत स्वर में कहा,
“बच्चों, जब कोई आपके सामने किसी की निंदा करता है, तो पहले सुनो, लेकिन ध्यान उसी पर दो जो बोल रहा है। उस व्यक्ति को पहचानो, न कि जिसे वह लेकर आलोचना कर रहा है। जो व्यक्ति दूसरों की बुराई करता है, उसका असली चेहरा वहीं सामने आता है।”
मोहल्ले के लोग चुप हो गए। यह सरल बात थी, पर असर गहरा था।
धीरे-धीरे मोहल्ले का माहौल बदलने लगा। बच्चे अब दूसरों की निंदा सुनकर खुद को नहीं घबराते। लोग समझने लगे कि आलोचना करने वाला अपने भीतर की असुरक्षा दिखा रहा होता है। शर्मा और वर्मा परिवारों के रिश्ते पहले से अधिक सम्मान और समझदारी भरे हो गए।
एक दिन करण ने पिता से कहा,
“पापा, अब मैं समझ गया—जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वो अपने अंदर की कमजोरी दिखा रहे होते हैं। हम दूसरों की आलोचना सुनकर खुद की अहमियत नहीं घटा सकते।”
राजेश मुस्कुराए।
“बिलकुल बेटा। यही असली शिक्षा है। कम बोलो, गहराई से सुनो—और दूसरों को उनकी आलोचना करने से खुद पहचानने का मौका दो। यही असली बुद्धिमत्ता है।”
और उस दिन मोहल्ले में एक छोटी सी सीख फैल गई—“किसी की निंदा सुनो, पर उसके असली चेहरे को समझो। और अपनी आत्मा को शांत और सशक्त रखो।”

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Rajeev Verma

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