रवि ने बहुत दिनों से अपने बेटे आदित्य में एक अजीब सा बदलाव देखा था। वह पहले जैसा खुलकर बात नहीं करता था। नज़रें झुका कर चलता, जल्दी कमरे में चला जाता, और छोटी-छोटी बातों पर चौंक जाता। रवि समझ गया था—यह उम्र का बदलाव है, शरीर का भी और मन का भी।
एक शाम आदित्य छत पर बैठा आसमान देख रहा था। हवा हल्की थी, लेकिन उसके चेहरे पर बोझ था।
रवि चुपचाप जाकर उसके पास बैठ गया।
“सब ठीक है, बेटा?” उसने धीरे से पूछा।
आदित्य ने कंधे उचका दिए। “पता नहीं, पापा… लोग कुछ-कुछ कहते रहते हैं। स्कूल में, दोस्तों में… क्या सही है, क्या गलत—समझ नहीं आता।”
रवि ने गहरी साँस ली।
“जब इंसान बड़ा होता है, तो सिर्फ़ लंबाई नहीं बढ़ती, भावनाएँ भी बदलती हैं। शरीर भी बदलता है, सोच भी। यह डरने की नहीं, समझने की उम्र होती है।”
आदित्य ने झिझकते हुए कहा, “पर लोग कहते हैं कि कुछ बातें सोचनी भी गलत होती हैं… कि अगर मन में कुछ अजीब आए तो इंसान खराब हो जाता है।”
रवि हल्के से मुस्कराया।
“दुनिया ने बहुत सी बातें डर से बना ली हैं, सच से नहीं। ज़्यादातर मिथक डर से पैदा होते हैं—ताकि लोग सवाल न करें।”
उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, तुम्हारा शरीर तुम्हारा है। उसका बदलना, नई भावनाओं का आना—ये सब प्रकृति का नियम है। इसमें शर्म की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। शर्म तब पैदा होती है, जब बिना समझे डर सिखाया जाता है।”
आदित्य की आँखों में पानी भर आया।
“तो… मैं गलत नहीं हूँ?”
रवि ने प्यार से कहा,
“नहीं। तुम इंसान हो। और इंसान होना मतलब महसूस करना, सवाल करना, सीखना।”
फिर वह थोड़ा गंभीर हुआ।
“लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—
अपनी और दूसरों की इज़्ज़त सबसे ऊपर है।
निजता का सम्मान ज़रूरी है।
और कोई भी काम ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे किसी को चोट पहुँचे—खुद को भी नहीं, किसी और को भी नहीं।”
आदित्य धीरे-धीरे शांत होने लगा।
“आप मुझे डांटेंगे नहीं?”
रवि ने सिर हिलाया।
“डर से इंसान नहीं बनता, बेटा। समझ से बनता है।
जो पिता सिर्फ़ डांटता है, वह चुप कराता है।
जो पिता समझाता है, वह इंसान बनाता है।”
उस रात आदित्य बहुत देर बाद चैन से सोया। उलझन पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी, लेकिन शर्म खत्म हो चुकी थी। अब सवाल डर के साथ नहीं, भरोसे के साथ आते थे।
और रवि भी बहुत कुछ सीख गया था। उसने समझा—
बच्चों को सही रास्ता नियमों से नहीं, रिश्तों से मिलता है।
डर दिखाकर नहीं, भरोसा देकर मिलता है।
चुप कराकर नहीं, सुनकर मिलता है।
कभी-कभी पिता का सबसे बड़ा उपहार
सीख नहीं होता,
डाँट नहीं होती—
बस यह भरोसा होता है कि
“तुम जैसे हो, वैसे ही ठीक हो…
और मैं तुम्हारे साथ हूँ।”