अनिरुद्ध और मीरा की शादी को आठ साल हो चुके थे। उनका जीवन शांत था, पर कहीं न कहीं एक खालीपन था—जैसे बातें होती थीं, पर दिल नहीं खुलता था; साथ रहते थे, पर जुड़ाव कम हो गया था। दोनों ने इसे समय की थकान समझकर अनदेखा कर दिया।
इसी दौरान मीरा की ज़िंदगी में आर्यन आया—उसके ऑफिस का नया सहकर्मी। आर्यन ध्यान से सुनता था, छोटी बातों पर भी मुस्कराता था, मीरा की थकान को शब्दों में पहचान लेता था। मीरा को पहली बार लगा कि कोई उसे सच में “देख” रहा है। धीरे-धीरे बातें बढ़ीं, मैसेज लंबे हुए, और एक दिन मीरा ने खुद से स्वीकार किया—वह आर्यन से प्रेम करने लगी है।
पर उसके भीतर अपराधबोध भी था। वह अनिरुद्ध से नज़र नहीं मिला पाती थी। उसका व्यवहार बदल गया—चुप, उलझी हुई, और अक्सर खोई-खोई। अनिरुद्ध ने यह सब देखा, पर कुछ नहीं कहा। वह प्रतीक्षा करता रहा—सच के अपने आप सामने आने की।
एक रात मीरा टूट गई। उसने काँपती आवाज़ में कहा,
“मैंने किसी और से प्रेम कर लिया है… मैं तुम्हें धोखा दे रही हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा रोने लगी, सिर झुका लिया। उसे लगा अब सब खत्म हो जाएगा—गुस्सा, अपमान, तिरस्कार।
पर अनिरुद्ध कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“तुम्हें यह कहने में बहुत हिम्मत लगी होगी। मैं सुन रहा हूँ… बताओ, तुम्हें क्या मिला जो मुझसे छूट गया?”
मीरा हैरान रह गई। उसने धीरे-धीरे सब कहा—अपनी अकेलापन, अनसुनी चाहें, और आर्यन के साथ मिली भावनात्मक नज़दीकी।
अनिरुद्ध की आँखें नम हो गईं, पर उसकी आवाज़ स्थिर थी।
“शायद मैंने तुम्हें समय नहीं दिया। शायद मैं तुम्हें समझ नहीं पाया।”
मीरा रो पड़ी,
“मैं गलत हूँ, अनिरुद्ध। मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ।”
अनिरुद्ध ने उसका हाथ थाम लिया।
“क्षमा मनुष्य के चरित्र का वह उज्ज्वल पक्ष है, जिसकी चमक सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मंद नहीं पड़ती। अगर मैं तुम्हें तोड़ दूँ, तो हम तीनों टूटेंगे। अगर मैं माफ़ कर दूँ, तो शायद कोई संभल सके।”
उसने आर्यन से मिलने की बात कही। मीरा डर गई, पर अनिरुद्ध शांत था।
अगले दिन तीनों मिले। आर्यन शर्म से झुका हुआ था। अनिरुद्ध ने कहा,
“मैं तुमसे लड़ने नहीं आया। मैं बस सच जानना चाहता हूँ—तुम मीरा को क्या दे सकते हो?”
आर्यन ने कहा,
“मैं उसे समझता हूँ, पर मैं उसे वैसा जीवन नहीं दे सकता जैसा आप देते हैं। मैं उसकी खुशी चाहता हूँ, अपने लिए नहीं।”
अनिरुद्ध ने मीरा की ओर देखा,
“फैसला तुम्हारा है। मैं तुम्हें बाँधूँगा नहीं। अगर तुम जाओगी, मैं रोकूँगा नहीं।”
मीरा रोती हुई बोली,
“मैंने समझ लिया… मुझे प्रेम नहीं, अपनापन चाहिए। और वह मुझे तुमसे मिला है।”
उसने आर्यन से विदा ली। आर्यन ने कहा,
“तुम दोनों को देखकर समझ आया—क्षमा उन फूलों के समान है, जो कुचले जाने के बाद भी खुशबू देना बंद नहीं करते।”
मीरा और अनिरुद्ध घर लौटे। रास्ता वही था, पर मन हल्का था।
मीरा ने कहा,
“तुमने मुझे बचा लिया।”
अनिरुद्ध बोला,
“नहीं, क्षमा ने हमें बचाया।”
और उस दिन दोनों ने जाना—
क्षमा दिल को हल्का करती है, रिश्तों को गहरा करती है, और जीवन को सरल बना देती है।