नीलम को लगता था, “यही तो परिवार है।”
शेखर को लगता था, “यही मेरी दुनिया है।”
पर समय के साथ रिश्तों में एक नई चीज़ जुड़ गई—अपेक्षा।
नीलम चाहती थी कि शेखर हर बात समझे बिना कहे।
शेखर चाहता था कि नीलम उसकी थकान बिना बताए समझ ले।
बच्चे चाहते थे कि माँ-पापा हर इच्छा तुरंत पूरी करें।
और शेखर के माता-पिता चाहते थे कि अब भी सब कुछ उनके हिसाब से चले।
धीरे-धीरे घर में आवाज़ें बढ़ने लगीं, मुस्कानें कम।
हर किसी को लगता था—“मैं सही हूँ, बाकी नहीं समझते।”
एक दिन नीलम ने कहा,
“तुम्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं।”
शेखर ने जवाब दिया,
“तुम मेरी मेहनत नहीं देखती।”
बच्चों ने कहा,
“आप लोग कभी खुश नहीं रहते।”
माँ ने कहा,
“आजकल कोई हमारी नहीं सुनता।”
घर, जो कभी सुकून था, अब अदालत बन गया था।
एक शाम बिजली चली गई। अँधेरे में सब चुपचाप बैठे रहे। कोई टीवी नहीं, कोई मोबाइल नहीं।
पायल बोली,
“माँ, पहले जब लाइट जाती थी, हम खेलते थे न?”
नीलम को पुरानी बातें याद आ गईं।
शेखर ने धीमे से कहा,
“तब हमारे पास कम था, लेकिन शिकायत भी कम थी।”
माँ ने कहा,
“तब हम एक-दूसरे से उम्मीद कम करते थे, साथ ज़्यादा देते थे।”
उस अँधेरे में सबको एक बात साफ दिखी—
रिश्ते तब तक हल्के रहते हैं, जब तक उनमें सिर्फ अपनापन होता है, हिसाब नहीं।
अगले दिन नीलम ने चाय शेखर को बिना कुछ कहे दी।
शेखर ने बच्चों के साथ बैठकर होमवर्क किया।
माँ ने किसी बात में टोका नहीं, बस मुस्कराईं।
बच्चों ने भी ज़िद कम कर दी।
सबने एक छोटा सा फैसला किया—
कम उम्मीद, ज़्यादा समझ।
कम शिकायत, ज़्यादा साथ।
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।
झगड़े पूरी तरह खत्म नहीं हुए, पर कड़वाहट कम हो गई।
एक दिन आदित्य ने कहा,
“अब हमारा घर फिर से घर जैसा लगने लगा है।”
शेखर ने मुस्कराकर कहा,
“क्योंकि अब हम रिश्ते निभा रहे हैं, बोझ नहीं बना रहे।”
नीलम ने धीरे से जोड़ा,
“रिश्ते दर्द तब देते हैं, जब हम उनसे ज़्यादा माँगते हैं, कम देते हैं।”
और उस दिन सब समझ गए—
रिश्ते प्यार से बनते हैं,
पर टिकते हैं समझ से।