लघु कथा -15

रमेश शहर के बाहरी हिस्से में एक छोटी सी झोपड़ी में रहता था। दिन भर वह ईंट-भट्ठे पर काम करता, धूप, धूल और थकान के बीच अपनी ज़िंदगी घसीटता। उसकी कमाई कम थी, जरूरतें ज़्यादा। घर में बूढ़ी माँ, बीमार पत्नी और दो छोटे बच्चे—हर चेहरा उससे उम्मीद लगाए देखता था।
रमेश की सबसे बड़ी दुश्मन गरीबी नहीं थी, चिंता थी।
वह हर समय सोचता रहता—
कल काम मिला तो?
मालिक ने निकाल दिया तो?
बच्चों की फीस कैसे भरूँगा?
दवा के पैसे कहाँ से आएँगे?
ये सवाल उसके दिमाग में ऐसे घूमते जैसे मच्छर रात में कान के पास। उसे चैन से सोने नहीं देते।
एक दिन काम पर मालिक ने कहा, “आज काम कम है, कुछ लोग छुट्टी पर रहेंगे।”
रमेश का दिल बैठ गया। उसने बिना कुछ पूछे काम छोड़ दिया और घर लौट आया। रास्ते भर वह डरता रहा—अब क्या होगा?
घर पहुँचकर उसने गुस्से और घबराहट में पत्नी से कहा,
“अब सब खत्म है। कुछ नहीं बचेगा।”
पत्नी ने डरते हुए कहा,
“ठीक से बात तो करो, हुआ क्या?”
लेकिन रमेश सुनने की हालत में नहीं था।
शाम को पास के मोहल्ले में उसके दोस्त शंकर से मुलाकात हुई। शंकर ने पूछा,
“काम से इतनी जल्दी?”
रमेश ने सारी बात कह दी।
शंकर बोला,
“तूने पूछा नहीं कि छुट्टी किसकी होगी? कभी-कभी सिर्फ़ आधे दिन का काम होता है।”
रमेश का सिर चकरा गया। वह डर में फैसला कर बैठा था।
अगले दिन वह फिर भट्ठे पर गया। मालिक ने कहा,
“कल आधे दिन का ही काम था, इसलिए कुछ लोग पहले चले गए थे। आज पूरा काम है। तू क्यों नहीं आया?”
रमेश को लगा जैसे किसी ने उसके माथे पर थपकी दी हो।
उसे पहली बार समझ आया—
चिंता ने उसे सच देखने नहीं दिया।
डर ने उससे पूछना भी छीन लिया।
उसी दिन उसकी माँ ने धीरे से कहा,
“बेटा, हालात से मत डर। डर से हालात और बिगड़ते हैं।”
उसकी बातें रमेश के दिल में उतर गईं।
धीरे-धीरे रमेश ने अपनी आदत बदली।
अब वह हर डर के साथ सवाल पूछता।
हर परेशानी को पहले समझता, फिर फैसला करता।
एक दिन पैसे खत्म हो गए। पुराना रमेश घबरा जाता, छुप जाता। नया रमेश पास के स्कूल गया, मास्टर से बोला,
“कुछ दिन फीस देर से हो जाए तो चलेगा?”
मास्टर ने कहा, “हाँ, हालात ठीक होने तक।”
रमेश ने महसूस किया—
चिंता अक्सर हालात को और बिगाड़ देती है।
वह सोच को धुंधला कर देती है,
डर में फैसले करवा देती है।
पर जब इंसान डर की जगह समझ से चलता है,
तो रास्ते अपने आप दिखने लगते हैं।
उस रात रमेश पहली बार चैन से सोया।
झोपड़ी वही थी, गरीबी वही थी,
लेकिन मन हल्का था।
उसे पता चल गया था—
गरीबी से लड़ा जा सकता है,
पर चिंता से नहीं।
चिंता को छोड़कर ही
ज़िंदगी को थामा जा सकता है।

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Rajeev Verma

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