अभय और निखिल बचपन के दोस्त थे। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, दोनों साथ चले। फर्क सिर्फ़ इतना था कि अभय हमेशा “समझदार” बनना चाहता था और निखिल हमेशा “सुनना” चाहता था।
अभय को सलाह देना अच्छा लगता था।
कोई दुखी हो—वह रास्ता बता देता।
कोई उलझा हो—वह हल निकाल देता।
उसे लगता था कि यही दोस्ती है।
निखिल कम बोलता था। वह ज़्यादा सुनता था। दोस्त रोते, गुस्सा करते, टूटते—निखिल बस उनके साथ बैठता। कभी-कभी सिर्फ़ चाय पकड़ाता, कभी चुपचाप कंधा दे देता।
एक दिन निखिल की ज़िंदगी बिखर गई। उसकी शादी टूट गई। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। वह अंदर से टूट चुका था। वह सीधे अभय के पास गया।
अभय ने उसे देखा और तुरंत शुरू हो गया—
“देख, मैंने पहले ही कहा था, तुमने जल्दबाज़ी की।”
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
“अब तुम्हें ये करना चाहिए, वो करना चाहिए…”
निखिल चुप बैठा रहा।
पर उसकी आँखें खाली थीं।
कुछ दिन बाद निखिल अभय से मिलने नहीं आया।
फिर हफ्ते बीते, फिर महीने।
एक दिन अभय ने खुद जाकर पूछा,
“तू मुझसे दूर क्यों हो गया?”
निखिल ने धीरे से कहा,
“तू मुझे ठीक करना चाहता था…
मुझे समझना नहीं।”
अभय चुप हो गया।
कुछ समय बाद अभय की अपनी ज़िंदगी में उथल-पुथल हुई। नौकरी छूट गई, रिश्ता टूटने लगा, घर में तनाव बढ़ गया। वह बिखर गया। पहली बार वह निखिल के पास गया—बिना किसी सवाल के, बिना किसी योजना के।
वह बोला, “आज कुछ मत कहना… बस बैठ जा मेरे साथ।”
निखिल आकर उसके पास बैठ गया।
न कोई सलाह, न भाषण।
बस चुप्पी, और साथ।
उस शाम अभय बहुत रोया।
निखिल ने सिर्फ़ इतना किया—उसके पास बैठा रहा।
घर लौटते समय अभय ने कहा,
“आज समझ आया…
तू मुझे ठीक नहीं कर रहा था,
तू मुझे टूटने की जगह दे रहा था।”
निखिल मुस्कराया।
कुछ दिनों बाद अभय फिर संभलने लगा—अपने तरीके से, अपनी गति से।
एक दिन अभय ने कहा,
“अब मुझे समझ आ गया है—
जीवन की सबसे अच्छी सलाह यही है—
किसी को सलाह मत दो।
सुनो।
समझो।
साथ दो।
सम्मान करो।”
निखिल ने कहा,
“क्योंकि हर इंसान अपने जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक खुद होता है।
और जब वह खुद सीख लेता है,
तो किसी सलाह की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
अभय ने सिर हिलाया।
“कम बोलो, गहराई से सुनो—
यही असली बुद्धिमत्ता है।”