नीरज और कविता की शादी को दस साल हो चुके थे। शुरुआत में दोनों सपनों की तरह साथ चलते थे—एक ही दिशा, एक ही उम्मीद। पर जैसे-जैसे समय बीता, ज़िंदगी ने अपने रंग दिखाने शुरू किए। कभी नीरज की नौकरी बदली, कभी कविता की तबीयत बिगड़ी, कभी पैसों की तंगी, कभी बच्चों की चिंता। हर साल कुछ न कुछ बदलता रहा।
कविता को शिकायत करने की आदत पड़ गई थी।
“हमेशा ही गलत समय क्यों आता है?”
“हमारी योजनाएँ ही क्यों बिगड़ती हैं?”
वह हर बदलाव से लड़ती थी, जैसे ज़िंदगी उससे दुश्मनी कर रही हो।
नीरज चुपचाप सुनता, लेकिन भीतर से वह भी टूटने लगा था।
एक दिन दोनों पास के पार्क में टहलने गए। वहाँ एक बूढ़ा माली पौधों की कटाई कर रहा था। ठंडी हवा चल रही थी और कुछ पत्ते झर चुके थे। कविता बोली,
“देखो, कितने सूखे पौधे हैं। ये माली ठीक से देखभाल नहीं करता।”
माली ने सुन लिया। वह मुस्कराया और बोला,
“बीबी, ये सूखे नहीं हैं… ये सर्दी की तैयारी कर रहे हैं। हर मौसम का अपना काम होता है।”
कविता चुप हो गई। माली ने आगे कहा,
“मैं मौसम से नहीं लड़ता। मैं उसके साथ काम करता हूँ।
गर्मी में पानी बढ़ाता हूँ,
सर्दी में काट-छाँट करता हूँ,
बरसात में सहारा देता हूँ।
अगर मैं मौसम से लड़ने लगूँ, तो बाग़ ही खत्म हो जाए।”
घर लौटते समय नीरज ने कहा,
“शायद हम भी मौसम से लड़ रहे हैं, कविता। ज़िंदगी के मौसम से।”
उस रात कविता बहुत देर तक सोचती रही। उसे एहसास हुआ कि वह हर बदलती परिस्थिति को दुश्मन समझ रही थी, जबकि वह बस एक नया मौसम थी।
धीरे-धीरे उसने शिकायत कम करनी शुरू की।
पैसों की कमी आई—तो बोली, “चलो, नए तरीके से बचत सीखते हैं।”
नीरज की नौकरी बदली—तो बोली, “नई शुरुआत भी तो अच्छा मौका है।”
बच्चों की परेशानी आई—तो बोली, “साथ बैठकर हल निकालते हैं।”
अब उसकी ऊर्जा शिकायत में नहीं, समाधान में लगने लगी थी।
घर का माहौल हल्का होने लगा।
नीरज ने भी राहत महसूस की। दोनों फिर से एक-दूसरे के साथी बन गए, विरोधी नहीं।
एक दिन कविता ने वही पार्क फिर देखा। पौधों में नई कोपलें आ चुकी थीं। उसने मुस्कराकर कहा,
“देखो नीरज, मौसम बदल गया।”
नीरज बोला,
“और हम भी।”
कविता ने धीरे से कहा,
“अब समझ आया…
ऋतुएँ बदलेंगी ही—चाहे हमें पसंद हों या नहीं।
चुनौतियाँ आएँगी, योजनाएँ बदलेंगी।
पर अगर हम उनसे लड़ने के बजाय उनके साथ चलें,
तो ज़िंदगी आसान नहीं, पर शांत ज़रूर हो जाती है।”
नीरज ने उसका हाथ थाम लिया।
अब उनके बीच शिकायत नहीं थी—
बस समझ थी, और हर बदलते मौसम में साथ चलने का भरोसा।