रवि अपने पिता को बहुत कम बोलते हुए देखता था। घर में अगर कोई सबसे ज़्यादा चुप रहता था, तो वही थे। न डांट, न लंबी सीख, न भाषण। बस रोज़ सुबह तय समय पर उठना, काम पर जाना, शाम को लौटकर किताब पढ़ना और फिर सो जाना—एक सी दिनचर्या, बिना शिकायत।
रवि को कभी-कभी गुस्सा आता।
“पापा कुछ बोलते ही नहीं… जैसे उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता,” वह माँ से कहता।
माँ मुस्करा कर कहती, “वह बोलते नहीं, जीते हैं।”
एक दिन रवि परीक्षा में फेल हो गया। उसे उम्मीद थी कि पिता डांटेंगे या कुछ समझाएंगे। वह डरते-डरते घर आया। पिता ने रिपोर्ट कार्ड देखा, कुछ नहीं कहा। बस उसे अपने साथ बैठने को कहा।
उस शाम पिता ने बिना एक शब्द बोले वही किया जो रोज़ करते थे—किताब पढ़ी, समय पर खाना खाया, और रवि से बस इतना कहा,
“कल सुबह मेरे साथ उठना।”
अगली सुबह रवि उनके साथ उठा। पिता खेत में काम करने लगे—मिट्टी खोदना, पौधों को पानी देना, टूटी मेड़ ठीक करना। धूप तेज़ थी, हाथ थक गए, पर पिता बिना रुके काम करते रहे। न शिकायत, न थकान की बात।
रवि धीरे-धीरे समझने लगा—यह चुप्पी खाली नहीं है, इसमें मेहनत भरी है।
कई दिनों तक रवि उनके साथ उठने लगा। पढ़ाई के बाद खेत, फिर किताब, फिर नींद—वही अनुशासन। पिता कभी यह नहीं बोले, “पढ़ाई करो,”
पर उनका हर दिन यही कह रहा था—लगातार चलो, रुको मत।
धीरे-धीरे रवि की आदतें बदलने लगीं। वह समय पर उठने लगा, पढ़ने लगा, खेल छोड़कर मेहनत करने लगा। पिता कुछ नहीं बोले, बस वही करते रहे जो हमेशा करते थे।
सालों बाद रवि बड़ा होकर एक अच्छा अफ़सर बन गया। जब लोग उससे सफलता का राज पूछते, वह कहता,
“मेरे पिता ने कभी भाषण नहीं दिया।
उनका मौन ही मेरा गुरु था।”
एक दिन उसने पिता से कहा,
“आपने कभी मुझे कुछ समझाया क्यों नहीं?”
पिता मुस्कराए और बोले,
“जब गरुड़ उड़ता है, तो वह घोषणा नहीं करता।
जब शेर चलता है, तो वह परिचय नहीं देता।
उनका होना ही संदेश होता है।”
रवि समझ गया—
मौन कर्म के रूप में बोलता है।
मौन अनुशासन बन जाता है।
मौन निरंतरता सिखाता है।
और वही मौन, एक दिन सफलता बनकर सामने आता है।
उस दिन रवि ने जाना—
सबसे ज़ोर से वही बोलता है,
जो बिना बोले जीता है।