अमन अपने ऑफिस और परिवार में सबसे “एडजस्ट करने वाला” इंसान माना जाता था। सब कहते थे, “यह कभी मना नहीं करता।” और वे इसे तारीफ़ समझते थे। लेकिन अमन सच्चाई जानता था—वह थक चुका था, भीतर से खाली होता जा रहा था, और धीरे-धीरे खुद से गायब हो रहा था।
ऑफिस में वह थकने के बाद भी देर तक रुकता था। बॉस कहते, “बस आज ही रुक जाओ,” और अमन सिर हिला देता। सहकर्मी कहते, “तुम यह बेहतर कर लेते हो, तुम ही कर दो,” और अमन मान जाता। घर में वह अपनी योजनाएँ छोड़ देता ताकि बाकी लोग आराम में रहें। दोस्तों के लिए वह हमेशा मौजूद रहता, सबकी बातें सुनता, सबके काम करता, लेकिन किसी ने कभी उससे नहीं पूछा कि वह कैसा है।
एक शाम अमन अपने बिस्तर पर बैठा दीवार को घूर रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी में मेहमान है। उसका फोन बजा—फिर कोई काम, फिर कोई फरमाइश। उसकी उँगलियाँ “ठीक है” लिखने ही वाली थीं, जैसे हमेशा लिखता था। तभी उसकी माँ की पुरानी बात उसके मन में गूंज गई—
“दुनिया वही व्यवहार करती है, जिसकी तुम उसे अनुमति देते हो।”
उस रात अमन ने चुपचाप एक फैसला लिया।
अगले दिन बॉस ने फिर कहा, “आज भी देर तक रुकना पड़ेगा।” उसका दिल तेज़ धड़कने लगा, लेकिन उसने शांति से कहा, “मेरा काम पूरा हो चुका है, आज मैं नहीं रुक सकता।” कमरे में सन्नाटा छा गया। बॉस हैरान था। अमन डरा हुआ था, लेकिन भीतर से मजबूत भी महसूस कर रहा था।
कुछ सहकर्मी उससे दूरी बनाने लगे। कुछ कहने लगे कि वह “खुदगर्ज़” हो गया है। लेकिन एक अजीब बात और हुई—कुछ लोग उसका सम्मान करने लगे। वे उससे बात सोच-समझकर करने लगे। अब कोई भी उस पर सब कुछ नहीं डालता था।
दोस्तों के साथ उसने हर समस्या ठीक करना बंद कर दिया। जो दोस्त सिर्फ़ ज़रूरत पर फोन करते थे, उनके फोन वह हर बार नहीं उठाता। कुछ दोस्त दूर हो गए। दर्द हुआ, लेकिन वह समझ गया—वे उसे नहीं खो रहे थे, वे अपनी सुविधा खो रहे थे।
एक दिन एक पुराने दोस्त ने कहा, “तू बदल गया है।”
अमन हल्के से मुस्कराया, “नहीं, मैंने बस खुद को मिटाना बंद किया है।”
धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी हल्की होने लगी। उसे पढ़ने का समय मिलने लगा, टहलने का समय, और खुद के साथ चुपचाप बैठने का सुकून। पहली बार उसे लगा कि वह खुद का है।
एक दिन आईने के सामने खड़े होकर उसने वही चेहरा देखा, लेकिन आँखें बदली हुई थीं—डर नहीं था, शांति थी। उसने खुद से कहा,
“जब मैंने खुद का सम्मान करना शुरू किया, दुनिया ने अपने आप सीख लिया कि मुझे कैसे पेश आना है।”
और उस दिन अमन ने एक सच्चाई को दिल में बसा लिया—
सीमाएँ बनाना स्वार्थ नहीं है।
“ना” कहना बदतमीज़ी नहीं है।
आत्मसम्मान घमंड नहीं है।
यही सच में ज़िंदा होने की शुरुआत है।