थोड़ी सी सफेदी उसकी कनपटियों पर ऐसे उग आई थी, जैसे बारिश के बाद आसमान पर हल्की सी उजास। कंधे जिम्मेदारियों के बोझ से झुके रहते, और चेहरा जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाने का गवाह था। अनुभव ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी, क्योंकि उसी के सहारे वह अपने परिवार को वो सब देने की कोशिश करता था, जो उसे कभी नहीं मिला। समय की धारा में वह चुपचाप बहता जा रहा था, बिना शोर किए, बिना शिकायत किए।
पूरा दिन दुनिया से लड़कर थका-हारा जब वह घर लौटता, तो दिल में बस एक ही चाह होती—थोड़ा सा सुकून। लेकिन दरवाजे पर ही बच्चे खड़े मिलते। “पापा, ये लाए?” “वो क्यों नहीं लाए?” अगर कुछ नहीं लाता तो सवाल, और अगर कुछ लाता तो भी सवाल। वह क्या कहता? कैसे बताता कि आज जेब थोड़ी हल्की थी, सपने थोड़े भारी। कभी प्यार से समझाता, कभी डांट कर। बच्चों को तो उसकी बातें समझ में आ जातीं, लेकिन उनकी मासूम आंखों में उसके मन का बोझ नहीं दिखता। उसकी आंख के कोने में एक बूंद आंसू अक्सर जम जाती, पर वो किसी को नजर नहीं आती।
खाने की थाली में दो रोटियों के साथ पत्नी रोज दस चिंताएं परोस देती। कभी कहती, “तुमने बच्चों को सिर पर चढ़ा रखा है।” कभी शिकायत करती, “हर वक्त डांटते ही रहते हो, कभी प्यार से भी बात कर लिया करो।” बेटी बड़ी हो रही थी, बेटे की राह भटकने का डर था। पड़ोसियों के झगड़े, रिश्तेदारों की बातें, मोहल्ले की शिकायतें—सब वह चुपचाप सुन लेता। पानी का एक घूंट लेता और सारी बातें गले के नीचे उतार लेता, जैसे जहर की घूंट हो, जिसे पीना जरूरी है जिंदा रहने के लिए।
कहते हैं जिसने एक बार हलाहल पिया, वह देवता बन गया। लेकिन यहां तो हर रोज थोड़ा-थोड़ा विष पीना पड़ता है, सिर्फ इसलिए कि घर की सांसें चलती रहें। रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जैसे मर जाता—थकान से, चुप्पी से, जिम्मेदारियों के बोझ से। क्योंकि उसे पता था, सुबह फिर जिंदा होना है, फिर काम पर जाना है, फिर कमा कर लाना है, ताकि घर चल सके।
एक दिन वह देर तक नहीं उठा। पत्नी ने आवाज दी, बच्चों ने हिलाया। आंखें नहीं खुलीं। डॉक्टर आया, सिर हिलाया और बोला—“बहुत थक गया था।” उस दिन घर में सन्नाटा था। बच्चे पहली बार समझ पाए कि पापा क्यों कभी हंसते नहीं थे, क्यों उनकी आंखों में हमेशा कुछ रुका रहता था।
समय बीता। बच्चे बड़े हुए। जब वे खुद नौकरी करने लगे, थक कर घर लौटे, तो आईने में अपनी कनपटियों पर हल्की सी सफेदी देखी। तब उन्हें याद आया—वो आदमी, जो हर दिन मरता था, ताकि वे हर दिन जी सकें। और उनकी आंखों के कोने में भी, अब वही बूंद जमने लगी।