दुखी बैठा था वर्मा जी,
चेहरे पर लटका हुआ सवाल,
सोच रहे थे—“हाय राम!
क्यों ज़िंदगी है इतनी बेहाल?”
चाय ठंडी, बिस्कुट सख़्त,
मोबाइल में खत्म हो गया नेट,
ऊपर से बीवी बोली—
“आज फिर सब्ज़ी में है सिर्फ़ लौकी सेट!”
वर्मा जी बोले—“हाय मेरी क़िस्मत!”
दुनिया मुझसे क्यों है रूठी?
तभी पप्पू ने ज्ञान दिया—
“पापा, दुखी रहने से लौकी कड़वी से मीठी नहीं होती।”
परेशानी बोली—“मैं आई हूँ”
वर्मा जी बोले—“आ जा बहन!”
दुख ने कहा—“मैं भी रहूँ?”
वर्मा जी बोले—“रह जा, क्या फ़र्क़ पड़ता है अब?”
फिर बैठे तीनों मिलकर
चेहरा लटका, माहौल ग़मगीन,
तभी पड़ोसी शर्मा जी आए
हँसते हुए—बिलकुल बेफिक्री मशीन।
बोले—“क्या हुआ वर्मा जी ?”
“कुछ नहीं”—वर्मा जी ने कहा,
शर्मा जी हँसे—“तो फिर मुँह ऐसा क्यों
जैसे इनकम टैक्स ने रिश्ता तोड़ लिया?”
दुखी रहो तो क्या मिलता है?
चेहरे पर झुर्रियों का बोनस,
ब्लड प्रेशर फ्री में बढ़ता है,
डॉक्टर बन जाता है अपना दोस्त।
तनाव कहता—“आओ गले मिलो”
नींद कहती—“मुझसे दूरी रखो”,
खुशी चुपचाप कोने में बैठी
सोचती—“भाई, मुझे क्यों नज़रअंदाज़ करो?”
सोचो ज़रा—
दुखी होकर क्या EMI कम हो जाएगी?
क्या बॉस अचानक बोलेगा—
“आज से तुम्हारी तनख़्वाह दुगुनी हो जाएगी?”
क्या ट्रैफिक दुख देखकर
अपने आप रास्ता छोड़ देगा?
या पेट्रोल दुखी इंसान के लिए
दो रुपये सस्ता हो जाएगा?
बच्चा गिरा, रोने लगा,
माँ ने कहा—“हँस के उठ जा”,
रोते-रोते क्या घाव भरेगा?
या रोना ही प्लास्टर बन जाएगा?
परीक्षा में नंबर कम आए,
तो रो-रोकर क्या पेपर बदल जाएगा?
या हँसकर दोबारा पढ़ने से
अगली बार रिज़ल्ट सुधर जाएगा?
इसलिए सुनो भाई, सुनो बहन,
ज़िंदगी है चाय की प्याली,
कभी ज़्यादा मीठी, कभी फीकी,
पर पीनी तो है—चाहे खाली।
दुख आए तो कहो—“स्वागत है!”
पर उसे राजा मत बना दो,
खुशी को भी बोलने दो—
उसे हमेशा बाहर मत भगा दो।