उम्र पूछी तो बोले—
“अरे मत पूछो भाई!”
काग़ज़ कहता—पचपन,
दिल कहता—अब भी चालीस भाई
घुटने बोले—“शांत रहो”,
कमर ने लगाया ब्रेक,
दिमाग़ बोला—“आज छुट्टी है”,
पर ज़िंदगी बोली—“चलो, अभी तो है एक और चेक।”
सुबह उठे तो चश्मा ढूँढा,
चश्मा मिला—पर याद नहीं आया
क्यों ढूँढ रहे थे!
यही तो है उम्र का कमाल—
सब कुछ सामने,
पर मक़सद कहीं और पड़ा है।
अब बात करते हैं
सिर्फ़ जीने की—
ऑफिस, घर, EMI,
शनिवार का बाज़ार,
और रविवार को वही सवाल—
“सोएँ या ज़िंदगी से कुछ पूछें?”
ये है जीना—
साँस चल रही है,
दिल काम कर रहा है,
पर मुस्कान
फ़ाइल में बंद है।
और फिर आता है
सच में जीना—
जहाँ चाय ठंडी हो
पर बातें गर्म हों,
जहाँ बारिश में भीगते हुए
छाता घर भूल जाना
कोई अपराध नहीं लगता।
जहाँ उम्र बढ़ती है,
पर जिज्ञासा ज़िंदा रहती है,
जहाँ पेट पर चर्बी है,
पर सपनों में अभी भी
दौड़ लगाने की आदत रहती है।
सच में जीने वाले
घड़ी नहीं देखते,
लम्हे देखते हैं।
वे गिरते हैं,
फिर हँसकर कहते हैं—
“चलो, नया अनुभव मिला।”
जीना सिखाया जाता है
जिम्मेदारियों से,
पर सच में जीना
सीखा जाता है
मूर्खताएँ करने से।
थोड़ा हँसना,
थोड़ा रो लेना,
और कभी-कभी
खुद से कहना—
“चल यार, आज ज़िंदगी जीत गई।”
तो उम्र से मत डरिए,
वह तो बस गिनती है,
डरिए उस दिन से
जब हँसना कहे—
“मुझे अब फुर्सत नहीं।”
क्योंकि
सिर्फ़ जीना
एक आदत है,
और
सच में जीना
एक साहसिक फ़ैसला।