मैंने ईश्वर से फूल माँगे,
कोमल, सुगंध से भरे,
जिन्हें देख कर
थकान कुछ पल को रुक जाए,
और मन को लगे—
हाँ, यही तो सुख है।
पर ईश्वर ने
मेरी हथेलियों में
मौन की तरह
बारिश रख दी।
पहली बूँद गिरी
तो मैं चौंक गया,
दूसरी पर
मन भीगने लगा,
तीसरी तक आते-आते
मेरे सपने
मिट्टी की तरह गीले हो चुके थे।
मैंने कहा—
“यह क्या है प्रभु?
मैंने तो फूल माँगे थे,
ये आँसू-सी बारिश क्यों?”
ईश्वर मुस्कराया नहीं,
उसने उत्तर भी नहीं दिया,
बस
मुझे उस खेत के बीच
खड़ा रहने दिया
जहाँ बीज दबे थे—
अनदेखे, अनसुने।
बारिश तेज़ हुई,
रास्ते कीचड़ से भर गए,
पाँव फिसलते रहे,
और हर फिसलन ने
मुझे गिरने का
नया अर्थ सिखाया।
मैंने कई बार चाहा
छत की तलाश करूँ,
किसी सुरक्षित कोने में
सूखा खड़ा रहूँ,
पर तब
बीज सूखे ही रहते।
समय बीता।
बारिश थमी।
सूरज निकला—
संकोच से,
जैसे क्षमा माँग रहा हो।
तब मैंने देखा—
मेरे चारों ओर
वही फूल खिले थे
जिन्हें मैं माँग रहा था,
पर अब
उनकी जड़ें
मेरे भीतर थीं।
तभी समझ आया—
ईश्वर फूल नहीं देता,
वह
उगने की परिस्थितियाँ देता है।
वह दर्द देता है
ताकि जड़ें गहरी हों,
वह बारिश देता है
ताकि आत्मा
सूख न जाए।
मैंने ईश्वर से फूल माँगे थे,
और उसने मुझे बारिश दे दी—
क्योंकि वह जानता था,
फूल
बारिश के बिना
कभी जन्म नहीं लेते।