हम जो करते हैं, वही हमें बनाता है


राजीव वर्मा

मनुष्य का जीवन बड़ी–बड़ी घटनाओं से नहीं, बल्कि रोज़ किए जाने वाले छोटे–छोटे कार्यों से आकार लेता है। “हम जो करते हैं, वही हम पर असर करता है”—यह पंक्ति एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है। हमारे कर्म कभी भी तटस्थ नहीं होते। हर आदत, हर निर्णय और हर बार दोहराया गया व्यवहार धीरे–धीरे हमारे मन, शरीर, चरित्र और भविष्य को गढ़ता है। शुरू में हमें लगता है कि हम अपने कर्मों को नियंत्रित कर रहे हैं, लेकिन समय के साथ वही कर्म हमें नियंत्रित करने लगते हैं।


यह विचार केवल दर्शन या आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और जीवन के अनुभवों से भी जुड़ा हुआ है। जो हम बार–बार करते हैं, वही हम बन जाते हैं। हमारे कर्म हमारे भीतर निशान छोड़ते हैं—कभी दिखाई देने वाले, तो कभी अदृश्य।


कर्म पहचान बनाते हैं
शुरुआत में हर कर्म केवल एक निर्णय लगता है। आप तय करते हैं कि सुबह जल्दी उठना है या अलार्म बंद कर देना है। आप तय करते हैं कि गुस्से से जवाब देना है या शांति से। आप अनुशासन चुनते हैं या टालना। लेकिन जब ये निर्णय बार–बार दोहराए जाते हैं, तो वे हमारी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं।


कोई व्यक्ति एक दिन में आत्मविश्वासी, अनुशासित या लापरवाह नहीं बनता। ये गुण लगातार किए गए कर्मों से बनते हैं। जब आप बार–बार खुद से किए वादे निभाते हैं, तो आप खुद पर भरोसा करना सीखते हैं। जब आप जिम्मेदारी से बचते हैं, तो भीतर असुरक्षा जन्म लेती है। इस तरह कर्म केवल परिणाम नहीं देते, वे हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं।
समय के साथ हम क्या करते हैं और हम कौन हैं—इन दोनों के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।


आदतें—खामोश मूर्तिकार
आदतें इस बात का सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं कि हम जो करते हैं, वह हम पर कैसे असर करता है। एक आदत छोटी और बेनुकसान लग सकती है—देर रात तक जागना, व्यायाम टालना, या तनाव से बचने के लिए मोबाइल में खो जाना। लेकिन आदतें जुड़ती जाती हैं। वे हमारी सेहत, ऊर्जा, एकाग्रता और भावनात्मक स्थिति को धीरे–धीरे आकार देती हैं।


अच्छी आदतें हमें चुपचाप मजबूत बनाती हैं। नियमित पढ़ना दिमाग को तेज करता है। व्यायाम केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता भी बढ़ाता है। कृतज्ञता की आदत सोच को सकारात्मक बनाती है। ये बदलाव शोर नहीं करते, लेकिन एक दिन हमें एहसास होता है कि हम पहले से अधिक संतुलित और मजबूत हो चुके हैं।


बुरी आदतें भी धीरे–धीरे ही नुकसान करती हैं। वे प्रेरणा को कम करती हैं, जागरूकता को कुंद करती हैं और आत्मसम्मान को कमजोर करती हैं। अक्सर जब तक उनका प्रभाव दिखता है, तब तक वे गहरी जड़ें जमा चुकी होती हैं।

मानसिक और भावनात्मक प्रभाव
हमारे कर्म हमारे मन और भावनाओं पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जब हम समस्याओं से भागते हैं, तो वे हमारे दिमाग में और भारी हो जाती हैं। जब हम उनका सामना करते हैं, तो आत्मविश्वास बढ़ता है। जब हम झूठ बोलते हैं—खासकर खुद से—तो भीतर संघर्ष पैदा होता है। जब हम ईमानदारी से जीते हैं, तो मन में शांति आती है।


नकारात्मक कर्म अक्सर भावनात्मक बोझ बनकर लौटते हैं। अपराधबोध, बेचैनी और असंतोष अक्सर यूँ ही नहीं होते; वे उन कर्मों का परिणाम होते हैं जो हमारे मूल्यों के खिलाफ जाते हैं। वहीं, जब हमारे कर्म और मूल्य एक–दूसरे के अनुरूप होते हैं, तो मन स्थिर और शांत रहता है।


हम खुद से और दूसरों से कैसे बात करते हैं—यह भी एक कर्म है। बार–बार खुद की आलोचना करना मन को असफलता के लिए प्रशिक्षित करता है। बार–बार खुद को प्रोत्साहित करना भीतर सहारा पैदा करता है।


रिश्ते हमारे कर्मों का प्रतिबिंब हैं
दूसरों के साथ हमारा व्यवहार समय के साथ यह तय करता है कि रिश्ते कैसे होंगे—और हम खुद को उन रिश्तों में कैसे महसूस करेंगे। दयालुता विश्वास बनाती है। निरंतरता सम्मान पैदा करती है। उपेक्षा दूरी लाती है। कठोरता बचाव की भावना पैदा करती है।


रिश्ते अचानक नहीं टूटते; वे छोटे–छोटे कर्मों से धीरे–धीरे कमजोर होते हैं—वादे पूरे न करना, ध्यान से न सुनना, भावनात्मक रूप से दूर होना। इसी तरह मजबूत रिश्ते भी रोज़मर्रा के छोटे प्रयासों से बनते हैं।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिश्तों में हमारे कर्म हमारी आत्मछवि को भी गढ़ते हैं। करुणा से व्यवहार करने पर हम खुद को करुणाशील महसूस करते हैं। कड़वाहट से व्यवहार करने पर हमारा मन भी कठोर हो जाता है।


शरीर सब याद रखता है
हम जो करते हैं, उसका असर हमारे शरीर पर भी पड़ता है। नींद, भोजन, चलना–फिरना और तनाव से निपटने का तरीका—ये सभी समय के साथ शरीर में दर्ज हो जाते हैं। शरीर हमारी दिनचर्या को स्वीकार कर लेता है।


आराम को नज़रअंदाज़ करने से थकावट और बर्नआउट आता है। लगातार तनाव तंत्रिका तंत्र को चिंता की ओर मोड़ देता है। वहीं, शरीर की देखभाल—अच्छा भोजन, नियमित गतिविधि और विश्राम—जीवन शक्ति बढ़ाती है।


स्वास्थ्य केवल किस्मत या आनुवंशिकता नहीं है; यह व्यवहार से गहराई से जुड़ा हुआ है। शरीर ईमानदार दर्पण है—वह हमारे कर्मों को बिना पक्षपात के दिखाता है।


कर्म दिशा तय करते हैं
कई लोग सोचते हैं कि जीवन एक बड़े फैसले से बदलता है, लेकिन असल में दिशा छोटे–छोटे कर्मों से तय होती है। सफलता, असफलता, संतोष या पछतावा—ये सब घटनाएँ नहीं, प्रक्रियाएँ हैं।


जो व्यक्ति रोज़ सीखना चुनता है, वह बिना महसूस किए बुद्धिमान बनता जाता है। जो रोज़ आराम को चुनौती से ऊपर रखता है, वह धीरे–धीरे अपनी क्षमता सीमित कर लेता है। दोनों ही रास्ते सामान्य लगते हैं, लेकिन भविष्य को गहराई से प्रभावित करते हैं।


यही कारण है कि “हम जो करते हैं, वही हम पर असर करता है” इतनी प्रभावशाली बात है। यह हमें याद दिलाती है कि हम हर दिन अपने ही निर्माण में भाग ले रहे हैं।


दोष नहीं, जिम्मेदारी
अपने कर्मों के प्रभाव को समझना खुद को दोषी ठहराने के लिए नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी लेने के लिए है। दोष पीछे देखता है और शर्म पैदा करता है। जिम्मेदारी आगे देखती है और शक्ति देती है।


जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारे कर्म हमें गढ़ते हैं, तो हम यह भी स्वीकार करते हैं कि हम बदलाव की क्षमता रखते हैं। आज किया गया एक अलग कर्म, कल का अनुभव बदल सकता है।


ऐसे कर्म चुनें जो आपको बेहतर बनाएँ
जीवन केवल हमारे साथ घट नहीं रहा—हम अपने कर्मों से खुद को बना भी रहे हैं। हर कर्म एक छाप छोड़ता है। हर आदत यह तय करती है कि हम किस तरह के इंसान बन रहे हैं।


अगर जीवन में कुछ भारी, खाली या असंतुलित लग रहा है, तो अपने कर्मों को कोमलता से देखें—आलोचना नहीं, जिज्ञासा के साथ। खुद से पूछें: मेरे रोज़ के चुनाव मुझे क्या सिखा रहे हैं? क्योंकि सच यही है—हम जो करते हैं, वही हम पर असर करता है। और जब हम ऐसे कर्म चुनते हैं जो हमें पोषित करें, मजबूत बनाएँ और हमारे मूल्यों से मेल खाते हों, तब हम केवल अपनी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि खुद को भी बदलते हैं।

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Rajeev Verma

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