राजीव वर्मा
अक्सर “मैं बिज़ी हूँ” का मतलब यह नहीं होता कि व्यक्ति काम में डूबा है, बल्कि इसका अर्थ होता है—
“यह मेरे लिए इस समय महत्वपूर्ण नहीं है।”
यह बात कठोर लग सकती है, लेकिन सच अक्सर कठोर ही होता है।
लोग सीधे यह नहीं कहते कि:
– उन्हें बात करने में रुचि नहीं
– वे प्रयास नहीं करना चाहते
– वे उस रिश्ते को प्राथमिकता नहीं देते
इसलिए “बिज़ी” शब्द को ढाल बना लेते हैं।
रुचि होने पर व्यवहार बदल जाता है
जब किसी को सच में रुचि होती है:
– वह खुद संपर्क करता है
– वह समय तय करता है
– वह देर रात या सुबह जल्दी भी बात कर लेता है
– वह छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखता है
रुचि को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, वह अपने आप व्यवहार में दिख जाती है।
रिश्तों में समय ही प्रेम की भाषा है
प्यार, दोस्ती, अपनापन—इन सबकी एक साझा भाषा होती है: समय।
जो व्यक्ति:
– आपके लिए समय नहीं निकालता
– आपके संदेशों का जवाब टालता है
– मिलने को हमेशा टालता है
वह भले ही बड़े वादे करे, लेकिन उसका व्यवहार सच्चाई बोल देता है। क्योंकि प्रेम समय माँगता है—बचे-खुचे पलों में नहीं,
बल्कि प्राथमिकता में। हम खुद भी यही करते हैं ईमानदारी से देखें, तो हम खुद भी यही करते हैं। जिन लोगों या चीज़ों में हमारी दिलचस्पी नहीं होती, उनके लिए:
– हम व्यस्त हो जाते हैं
– जवाब देर से देते हैं
– मुलाक़ात टाल देते हैं
और जिनमें रुचि होती है, उनके लिए हम रास्ता बना ही लेते हैं। दूसरों को समझने से पहले, खुद को समझना ज़रूरी है।
“समझो, ज़ोर मत दो”
यह वाक्य हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाता है—
– अगर कोई आपके लिए समय नहीं निकाल रहा, तो उसे मजबूर मत कीजिए।
– बार-बार याद दिलाना
– शिकायत करना
– ग़लती खुद में ढूँढना
ये सब आत्मसम्मान को धीरे-धीरे कमजोर करते हैं। जहाँ रुचि होगी, वहाँ प्रयास होगा। जहाँ प्रयास नहीं, वहाँ जवाब अपने आप मिल जाता है।
रुचि और सम्मान का गहरा संबंध
समय निकालना केवल रुचि नहीं, सम्मान भी दर्शाता है।
जब कोई व्यक्ति आपको महत्व देता है:
– वह आपकी भावनाओं का ख्याल रखता है
– वह आपको इंतज़ार में नहीं रखता
– वह आपके समय को हल्के में नहीं लेता
इसलिए समय की कमी अक्सर सम्मान की कमी का संकेत होती है।
अपवाद भी होते हैं, पर नियम नहीं बदलता
हाँ, कभी-कभी परिस्थितियाँ सच में कठिन होती हैं—
बीमारी, आपात स्थिति, मानसिक थकान। लेकिन ये अस्थायी होते हैं, स्थायी नहीं। अगर “बिज़ी” हमेशा की कहानी है, तो वह परिस्थिति नहीं, चयन है।
सीख क्या है?
इस कथन का उद्देश्य किसी को दोष देना नहीं,
बल्कि हमें सच को स्वीकार करना सिखाना है।
जिनके लिए आप महत्वपूर्ण हैं, वे समय निकालेंगे
जिनके लिए नहीं, वे बहाने देंगे
और दोनों ही स्थितियों में,
आपका काम है:
– सच को पहचानना
– खुद का सम्मान बनाए रखना
– वहीं निवेश करना जहाँ प्रतिफल मिले
दार्शनिक निष्कर्ष
जीवन सीमित है, समय अमूल्य है। जो लोग आपको बार-बार इंतज़ार में रखते हैं, वे आपके समय का मूल्य नहीं समझते। और जो समझते हैं, वे कभी यह नहीं कहते—
“मैं बहुत बिज़ी हूँ।”
वे बस कहते हैं—
“मैं तुम्हारे लिए समय निकाल लूँगा।”
अंतिम शब्द याद रखिए—
– आप किसी के जीवन में विकल्प नहीं, प्राथमिकता बनने के योग्य हैं।
– जहाँ आपको बार-बार यह एहसास दिलाया जाए कि आप बोझ हैं, वहाँ रुकना नहीं चाहिए।
क्योंकि सच यही है—
– अगर कोई सच में इच्छुक है, तो वह समय बना ही लेता है।