चोर भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं ?

राजीव वर्मा


सामान्यतः “चोर” शब्द सुनते ही हमारे मन में नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं—अपराध, भय, नुकसान और असुरक्षा। समाज उन्हें अनैतिक, अवांछित और दंडनीय मानता है। लेकिन दर्शन का काम केवल सतह पर दिखने वाले सत्य को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी जटिल वास्तविकताओं को समझना भी है। यदि हम थोड़ी देर के लिए नैतिक निर्णय को स्थगित कर, विशुद्ध दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो एक चौंकाने वाला प्रश्न सामने आता है—क्या चोर भी किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भूमिका निभाते हैं?
यह प्रश्न अजीब लग सकता है, परंतु उत्तर खोजने पर हमें समाज, अर्थव्यवस्था और मानव स्वभाव के गहरे अंतर्संबंध दिखाई देते हैं।


भय से सुरक्षा तक: एक उद्योग की उत्पत्ति
यदि चोरी न होती, तो शायद ताले, चोर-रोधी अलमारियाँ, सेफ, लॉकर, ग्रिल, दरवाज़ों की जटिल कुंडियाँ और सुरक्षा तंत्र की इतनी व्यापक आवश्यकता न होती। चोर के अस्तित्व ने ही सुरक्षा उद्योग को जन्म दिया। इन वस्तुओं को बनाने वाली फैक्ट्रियाँ, उनमें काम करने वाले मज़दूर, इंजीनियर, डिज़ाइनर, ट्रांसपोर्टर—सभी को रोज़गार मिलता है। दर्शन के स्तर पर देखें तो यहाँ चोर एक अनचाहा प्रेरक बन जाता है, जो समाज को सतर्क और संगठित होने पर मजबूर करता है।


घर से लेकर राज्य तक: रोजगार की श्रृंखला
घर बनाते समय लोहे की ग्रिल, अतिरिक्त ताले, खिड़कियों की सुरक्षा—ये सभी कार्य कारीगरों, राजमिस्त्रियों और मज़दूरों को काम देते हैं। यहीं से यह श्रृंखला आगे बढ़ती है

– चौकीदार और सुरक्षा गार्ड
– सुरक्षा एजेंसियाँ
– CCTV, मेटल डिटेक्टर, अलार्म सिस्टम बनाने वाली कंपनियाँ
-;तकनीकी विशेषज्ञ और इंस्टॉलेशन स्टाफ


दर्शन कहता है कि हर समस्या अपने साथ समाधान का एक पूरा तंत्र लेकर आती है, और उस तंत्र में मानव श्रम और पूँजी दोनों प्रवाहित होते हैं।


कानून, न्याय और व्यवस्था का चक्र
चोरी के कारण पुलिस, अदालतें और जेलें अस्तित्व में हैं।
यदि अपराध न होते, तो शायद—
– पुलिसकर्मी
– वकील
– जज
– कोर्ट स्टाफ
– जेलर और कारागार कर्मी
इन सभी की आवश्यकता ही न पड़ती।


राज्य हथियार, वाहन, बैरिकेड, वर्दियाँ, संचार उपकरण खरीदता है—ये सभी खर्च अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह को बनाए रखते हैं।

यहाँ दर्शन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि व्यवस्था और अव्यवस्था एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं। अराजकता ही व्यवस्था को परिभाषित करती है।


उपभोग का पुनर्जन्म
जब मोबाइल, लैपटॉप, गाड़ी, पर्स या कोई घरेलू सामान चोरी होता है, तो व्यक्ति को उसे दोबारा खरीदना पड़ता है। इससे बाज़ार में मांग बढ़ती है, उत्पादन चलता है और व्यापार को गति मिलती है।


यह तथ्य भले ही व्यावहारिक हो, पर नैतिक रूप से असहज करता है। दर्शन यहीं हस्तक्षेप करता है और कहता है—
जो नैतिक रूप से गलत है, वह आर्थिक रूप से सक्रिय हो सकता है, पर उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।


राजनीति और “बड़े चोर”
इतिहास गवाह है कि कई कुख्यात अपराधी समय के साथ राजनीति में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ चोरी व्यक्तिगत न रहकर संस्थागत हो जाती है। यहाँ चोर का स्वरूप बदल जाता है—जेब काटने से लेकर नीति काटने तक।


दार्शनिक दृष्टि से यह समाज के नैतिक पतन का संकेत है, जहाँ अपराध शक्ति में बदल जाता है और जनता उसे स्वीकार करने लगती है।


दर्शन का निष्कर्ष: भूमिका बनाम महिमा
यह कहना कि चोर अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, एक तथ्यात्मक विश्लेषण हो सकता है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि चोरी को  ठहराया जाए।


दर्शन स्पष्ट करता है—
चोर कारण हैं, आदर्श नहीं
वे प्रणाली को चलाते हैं, पर उसे श्रेष्ठ नहीं बनाते उनका अस्तित्व समाज की कमज़ोरियों को उजागर करता है, न कि उसकी सफलता को जैसे बीमारी के कारण डॉक्टरों का अस्तित्व आवश्यक हो जाता है, वैसे ही चोरी के कारण सुरक्षा और न्याय तंत्र सक्रिय होते हैं। पर कोई भी स्वस्थ समाज बीमारी को बढ़ावा नहीं देता।


चोर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं—यह कथन व्यंग्यात्मक सत्य है, प्रशंसा नहीं। यह हमें आईना दिखाता है कि हमारा समाज किस तरह नकारात्मक तत्वों के चारों ओर भी आर्थिक संरचनाएँ खड़ी कर लेता है।


सच्ची प्रगति तब होगी जब अर्थव्यवस्था ईमानदारी, नवाचार और नैतिक श्रम से चले—न कि भय और अपराध से।
दर्शन हमें सिखाता है कि
समाज केवल चलना नहीं चाहिए, उसे सही दिशा में चलना चाहिए।

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Rajeev Verma

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