राजीव वर्मा
मोह और प्रेम
जानते ही मोह में
हम किसी को
कस के पकड़ लेते हैं,
डर होता है
कि कहीं
खो न जाए वह…
अपने ही साये में
उसे बाँधना चाहते हैं,
उसकी हँसी, उसके सपने
सब पर
अपना नाम लिख देते हैं।
मोह कहता है —
रुको,
मेरे पास ही रहो,
मेरी ही सीमाओं में
साँस लो।
पर प्रेम
धीरे से कहता है —
उसे उड़ने दो।
क्योंकि
जो पिंजरे में रहे
वह पास तो होगा,
पर अपना नहीं।
और जो खुले आकाश में
अपने पंख फैलाएगा,
अगर लौटकर आए
तो वही
सच में तुम्हारा है।
डर से थामा गया हाथ
कभी सुकून नहीं देता,
पर भरोसे से छोड़ा गया
हर रिश्ता
खुद लौटना जानता है।
प्रेम
अधिकार नहीं माँगता,
वह बस
रास्ते के मोड़ पर
खड़ा रहकर
मुस्कुराता है।
और कहता है —
जाओ,
अपनी उड़ान पूरी करो,
अगर सच में
मेरा होना लिखा है,
तो तुम
लौटकर जरूर आओगे।