मोह और प्रेम

राजीव वर्मा


मनुष्य का हृदय भावनाओं से बना है। जैसे ही हम किसी को जानने लगते हैं, उससे जुड़ने लगते हैं, एक अनकहा सा रिश्ता जन्म ले लेता है। यही रिश्ता धीरे-धीरे मोह का रूप ले लेता है। मोह वह अवस्था है जहाँ अपनापन इतना गहरा हो जाता है कि हम सामने वाले को खो देने के डर से उसे कसकर पकड़ लेना चाहते हैं। हमें डर लगता है कि कहीं वह हमसे दूर न चला जाए, कहीं कोई और उसे हमसे छीन न ले, कहीं वह हमारी ज़रूरत न रह जाए।

मोह में हम यह भूल जाते हैं कि सामने वाला भी हमारी तरह एक स्वतंत्र अस्तित्व है, जिसकी अपनी उड़ान है, अपने सपने हैं, अपनी मंज़िल है। हम अपने डर को प्रेम समझने की भूल कर बैठते हैं। हमें लगता है कि पकड़ कर रखना ही प्रेम है, अधिकार जताना ही अपनापन है, लेकिन सच इससे बिल्कुल उलट है।

डर मोह की जड़ है।
डर—अकेले रह जाने का।
डर—नज़रअंदाज़ हो जाने का।
डर—अपनी अहमियत खो देने का।
इसी डर में हम किसी को कस के पकड़ लेते हैं, उसकी सांसों तक पर पहरा बैठाने लगते हैं। हम उसके फैसलों में दखल देने लगते हैं, उसकी उड़ान की ऊँचाई नापने लगते हैं। हमें लगता है कि अगर हमने ढील दी, तो वह कहीं खो न जाए। पर वास्तव में, यही कसाव उसे हमसे दूर करने लगता है।

यहीं से मोह और प्रेम के बीच का फर्क सामने आता है।
प्रेम क्या कहता है?
प्रेम कहता है—
उसे उड़ने दो।
उसे अपने सपनों की दिशा चुनने दो।
उसे अपने फैसलों से सीखने दो।
प्रेम में डर नहीं, विश्वास होता है।
प्रेम में बंधन नहीं, स्वतंत्रता होती है।
अगर वह सच में तुम्हारा है, तो वह लौटकर जरूर आएगा।
प्रेम यह नहीं कहता कि तुम मेरी हो, इसलिए मेरी बात मानो।
प्रेम यह कहता है कि तुम अपनी हो, और मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।
प्रेम किसी को रोकता नहीं, थामता नहीं, जकड़ता नहीं। प्रेम सिर्फ साथ चलता है। और अगर रास्ते अलग भी हो जाएँ, तो प्रेम शिकायत नहीं करता, बल्कि मौन में भी शुभकामनाएँ देता है।

मोह क्यों दुख देता है?
मोह इसलिए दुख देता है क्योंकि उसमें अपेक्षाएँ होती हैं।
हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारे अनुसार चले, हमारे हिसाब से बदले, हमारी इच्छाओं को अपनी प्राथमिकता बनाए। जब ऐसा नहीं होता, तो हमें चोट लगती है। हम कहते हैं—“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, फिर भी तुम…?”
मोह हमें स्वार्थी बना देता है।
प्रेम हमें उदार बनाता है।
मोह में हम सवाल करते हैं—
कहाँ थे?
किसके साथ थे?
मुझे बताए बिना क्यों गए?
प्रेम में हम कहते हैं—
खुश रहो।
अपना ख्याल रखो।
जब मन हो, लौट आना।

उड़ान और लौटना
जो पक्षी पिंजरे में रखे जाते हैं, वे भले ही हमारे पास हों, लेकिन उनकी आँखों में आकाश नहीं होता।
और जो पक्षी खुले आकाश में उड़ते हैं, अगर वे लौटकर हमारे कंधे पर आ बैठें, तो वह लौटना सबसे सुंदर सत्य होता है।

प्रेम भी ऐसा ही है।
अगर तुमने किसी को उड़ने दिया है और वह लौटकर आता है, तो समझ लो—
वह मजबूरी में नहीं, चुनाव से लौटा है।
डर से नहीं, लगाव से लौटा है।
बंधन से नहीं, भाव से लौटा है।
और यही लौटना सबसे पवित्र होता है।
खोने का डर और पाने का साहस
मोह हमें सिखाता है—“कस के पकड़ो, वरना खो जाओगे।”
प्रेम हमें सिखाता है—“छोड़ने का साहस रखो, तभी सच्चा रिश्ता टिकेगा।”

अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि किसी को छोड़ देना हार नहीं होती। कभी-कभी छोड़ देना ही सबसे बड़ा प्रेम होता है। जब हम किसी की उड़ान रोकते हैं, तो हम उसके साथ-साथ खुद भी बंध जाते हैं।

प्रेम हमें मुक्त करता है—
डर से
असुरक्षा से
अधिकार की भावना से
आज के रिश्तों में यह सीख क्यों ज़रूरी है?
आज के समय में रिश्ते जल्दी बनते हैं, लेकिन उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं। वजह यही है—मोह को प्रेम समझ लेना। हम प्यार के नाम पर नियंत्रण चाहते हैं, आज़ादी नहीं। हम साथ के नाम पर कैद चाहते हैं, विश्वास नहीं।
अगर हम यह सीख लें कि
प्रेम उड़ान देता है और मोह पकड़ता है,
तो शायद रिश्ते बोझ नहीं, सुकून बन जाएँ।

अंत में बस इतना ही—
अगर किसी को जानकर ही तुम उसे कस के पकड़ लेना चाहते हो, तो रुक जाओ। अपने डर को पहचानो।
और अगर तुम सच में प्रेम करते हो, तो उसे उड़ने दो।
क्योंकि
जो सच में तुम्हारा है,
वह डर से नहीं,
प्रेम से लौटकर जरूर आएगा।

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Rajeev Verma

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