राजीव वर्मा
उसकी ख़ामोशी शोर से कम नहीं थी,
हर चुप्पी में कोई अधूरी चीख कैद थी।
वह दर्द को ओढ़कर चलती रही,
और आग में तपकर भी मुस्कुराती रही।
हँसी उसके चेहरे का नक़ाब थी,
अंदर भावनाओं का सैलाब उमड़ता रहा।
हर मोड़ पर हालातों ने उसे मोड़ा,
पर उसकी रीढ़ कभी टूट नहीं पाई।
लोगों ने उसे कमज़ोर समझ लिया,
क्योंकि उसने आवाज़ नीची रखी।
किसे पता था कि
शांत लहरों में भी
समंदर की ताक़त छुपी होती है।
उसकी आँखों ने बहुत कुछ सहा,
पर शिकायत करना उसने नहीं सीखा।
जो देख न सके उसके घावों की गहराई,
उन्हीं के बीच वह अपने पथ पर बढ़ती रही।
उसकी आत्मा शब्दों से आगे थी,
वह मौन में भी अपना सच रचती रही।
हर संघर्ष को उसने गीत बना लिया,
और हर हार से नया साहस चुनती रही।
वह औरत सिर्फ़ एक किरदार नहीं थी,
वह खुद एक पूरी दुनिया थी।
जिसने बिना शोर किए
अपनी पहचान खुद गढ़ी,
और इतिहास में
अपनी जगह छोड़ गई।