राजीव वर्मा
दिल जलने पर इश्क़ और
होंठ जलने पर चाय
सिर्फ़ अनाड़ी ही छोड़ते हैं
समझदार तो
दोनों को पूरे अदब से झेलते हैं।
इश्क़ में जलो तो शायर बनते हैं,
चाय में जलो तो “एक और कप” मांगते हैं।
इश्क़ जला दे तो दोस्त समझाते हैं,
चाय जला दे तो कहते हैं
“अरे! असली मज़ा तो यही है!”
वैसे चाय पे ना बहुत ज़िम्मेदारी है,
पर निभाती वो हर ज़िम्मेदारी है।
काम का बोझ हो,
या बॉस का रोज़-रोज़ का जोश हो,
फाइलें हों या टेंशन का पहाड़ हो
एक कप चाय बोले,
“पहले मुझे निपटा लो, फिर दुनिया संभाल लो।”
ख़राब दिन हो,
जब अलार्म ने धोखा दिया हो,
बस छूटा हो,
और किस्मत ने भी मुँह फेर लिया हो
तब चाय आती है बिना सवाल पूछे,
ना जजमेंट, ना सलाह,
बस भाप में लिपटी हुई राहत।
या रूठा दोस्त हो,
जो “Seen” करके भी रिप्लाई ना दे,
तब चाय कहती है
“चल, मैं सुन लेती हूँ,
तू सुना, वो बाद में मानेगा।”
या फिर टूटा दिल हो,
जिसके टुकड़े इतने हों
कि जोड़ने को Fevicol भी कम पड़ जाए
तब चाय कहती है,“पहले गर्म हो जा,
दिल बाद में जोड़ लेंगे।”
बस एक परफेक्ट चाय
सब कुछ हील कर देती है।
डॉक्टर ने भले दवा ना दी हो,
पर चाय ने पूरा इलाज कर दिया है।
इसीलिए जैसे ही तापमान का डाउनफाल होता है,
तो कम्बल का come back हो जाता है।
कम्बल बोले— “अब मेरी बारी!”
और चाय बोले— “मेरे बिना अधूरी तैयारी!”
सुबह-सुबह ठंड हो,
और नाक लाल हो जाए,
तो चाय ही है
जो उँगलियों में जान भर जाए।
कप हाथ में,
और भाप आँखों में
लगता है जैसे ज़िंदगी
फिर से चालू हो गई हो।
और चाय की डिमांड बढ़ जाती है
घर में नहीं, तो मोहल्ले में,
मोहल्ले में नहीं, तो दिल में।
इसीलिए बस अदरक वाली
कड़क चाय की प्याली से चीयर्स कीजिए
जिसमें अदरक हो इतना
कि सर्दी खुद कांप जाए,
और कड़कपन ऐसा
कि नींद भी माफ़ी माँग ले।
एक घूँट मेंगरमी, राहत और थोड़ी-सी खुशी,
दूसरे घूँट मेंहिम्मत, हँसी और ज़िंदगी की ताज़गी।
तो आइए जनाब,
ठंड को दूर भगाइए
कम्बल ओढ़िए, चाय चढ़ाइए,
और दुनिया से कहिए
“अभी मूड नहीं, पहले चाय पी लूँ…
फिर सब देख लेंगे!”