राजीव वर्मा
खाली जेब, भारी शोर
नगर के बीचों-बीच
एक विशाल चौराहा था,
जहाँ हर मौसम में
कोई न कोई आंदोलन उग आता था।
उस दिन भी
कुछ चेहरे इकट्ठा थे—
आँखों में गुस्सा,
हाथों में माइक,
और जेबों में
इतनी हवा कि पतंग उड़ जाए।
कहते थे—
“लूट हो गई है!”
भीड़ ने देखा—
“कहाँ?”
उत्तर आया—
“अरे भावनाओं में,
लोकतंत्र की रसोई में,
और सबसे ज़्यादा
हमारे भविष्य में!”
गिरधारी गैंग का प्रकट होना
ये कोई साधारण लोग नहीं थे,
ये थे
हार के बाद जन्मे योद्धा।
कल तक
जिनकी कुर्सी इतनी मुलायम थी
कि रीढ़ झुकने लगी थी,
आज वही
सड़क की धूल से
सत्य खोज रहे थे।
एक बोला—
“हम लुट गए!”
दूसरा बोला—
“हम ठगे गए!”
तीसरा बोला—
“हम समझ गए…
पर जनता नहीं समझी!”
तलाश उस चीज़ की जो थी ही नहीं
पुलिस आई,
पूछताछ हुई,
सूची बनाई गई—
“बताइए,
क्या-क्या गायब हुआ?”
सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
फिर किसी ने कहा—
“इज़्ज़त!”
दूसरा बोला—
“जनाधार!”
तीसरे ने धीरे से कहा—
“सीट!”
पुलिस ने लिखा—
“अमूर्त वस्तुएँ चोरी होने का दावा।”
भाषणबाज़ी का महायज्ञ
मंच सजा,
माला चढ़ी,
ढोल बजे,
और माइक गरजा।
“जनता के साथ धोखा हुआ है!”
इतनी बार कहा गया
कि जनता खुद
सोच में पड़ गई—
“कहीं सच में तो नहीं?”
हर वाक्य के बाद
तालियाँ खुद से बजतीं,
हर आँसू
कैमरे के एंगल से गिरता।
आईना जो देखना मना था
कोई बोला—
“आत्ममंथन कर लेते हैं।”
बाक़ी सब चौंक गए—
“ये कौन-सा नारा है?”
आईना सामने रखा गया,
सबने मुँह मोड़ लिया।
बोले—
“ये विदेशी साज़िश है!”
याददाश्त की चयन प्रक्रिया
इनकी स्मृति बड़ी अजीब थी—
जीत का दिन
उन्हें जन्मदिन लगता,
हार का दिन
उन्हें साज़िश।
कल तक जो फैसले
“जनहित” थे,
आज वही
“चोरी की पटकथा” बन गए।
सबूतों की पैकेजिंग
सबूत पेश किए गए—
भावनाएँ,
आशंकाएँ,
पुराने भाषणों के क्लिप,
और कुछ टूटे वादे
जो पहले खुद तोड़े गए थे।
कहा गया—
“इन्हें जोड़ो,
तो चोरी साबित हो जाएगी।”
विशेषज्ञों की सेना
स्टूडियो में
ज्ञानी प्रकट हुए—
एक बोला—
“जनता भ्रमित है।”
दूसरा बोला—
“जनता बहकी है।”
तीसरा बोला—
“जनता को हम समझा नहीं पाए…
इसलिए जनता दोषी है।”
चाय की दुकानों का न्यायालय
देश की सबसे तेज़ अदालत—
चाय की दुकान।
एक ने कहा—
“इनकी लुटिया तो थी ही नहीं।”
दूसरा बोला—
“फिर रो क्यों रहे हैं?”
तीसरा हँसा—
“रोने पर ही तो राजनीति चलती है।”
आंदोलन का वार्षिक उत्सव
हर हार के बाद
नया जुलूस,
नया बैनर,
नया गीत—
“हमें न्याय चाहिए!”
न्याय ने पूछा—
“किससे?”
उत्तर आया—
“जनता से!”
जिम्मेदारी का गायब होना
किसी ने पूछा—
“गलती किसकी?”
उत्तर में
सन्नाटा था,
इतना गहरा
कि उसमें जिम्मेदारी
डूब गई।
निशाना जनता
जब कुछ भी काम न आए,
तो सबसे आसान लक्ष्य—
वोटर।
“उसने गलत चुना!”
“वो बिक गया!”
“वो समझदार नहीं!”
कभी यह नहीं कहा गया—
“हम समझा नहीं पाए।”
घोषणापत्र का भूत
पुराने वादे
रात में टहलने लगे।
किसी ने देखा—
बिजली का वादा
मोमबत्ती लिए खड़ा था।
आख़िरी ढोल
फिर भी
ढोल बजते रहे,
नारे लगते रहे,
और गिरधारी
भटकते रहे।
खाली हाथ,
भरी आवाज़,
और अंतहीन शिकायत।
कविता की मुस्कराती सीख
अगर जेब में
कुछ रखा ही नहीं,
तो चोरी का शोर
सिर्फ़ शोर होता है।
अगर ज़मीन
पहले ही खिसक चुकी हो,
तो गिरने का दोष
धक्का नहीं होता।
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