राजीव वर्मा
भटक रहे चंद गिरधारी,
न गठरी भारी, न जेब भरी,
हाथ खाली, माथा तना,
पर शोर ऐसा जैसे तिजोरी भरी।
न लुटिया उनकी, न थाली,
न घर में घी, न दाल मसाली,
पर मंच सजा, माइक खड़ा,
और आवाज़ ऊँची — कमाल निराली।
चौराहे पर खड़े होकर बोले,
“भाइयो! लूट मची है भारी!”
भीड़ ने पूछा — “किसकी?”
बोले — “हमारी… बस हमारी!”
किसने लूटा? कब लूटा?
किधर गया माल सारा?
उत्तर आया आँख मिचकाकर —
“वो… अंधेरे में कोई था प्यारा!”
गली–गली पोस्टर चिपकाए,
जिसमें आँसू फोटोशॉप के,
कैप्शन लिखा — “न्याय चाहिए”,
नीचे सिग्नेचर चार सौ चोंच के।
जिन्होंने कल तक
कुर्सी को माई कहा,
आज ज़मीन पर बैठे–बैठे
ज़मीन खिसकने का रोना गाया।
कल तक जिनके
जेब में हाथ थे अपने,
आज वही चिल्ला रहे हैं —
“देखो! किसी ने काट लिए सपने!”
न उनका बटुआ, न पोटली,
न चप्पल, न रूमाल गया,
पर दर्द ऐसा जैसे
म्यूज़ियम से ताज गिरा।
एक बोला —
“हम तो ईमानदार थे जनाब!”
पीछे से आवाज़ आई —
“तभी तो जनता ने बदला हिसाब।”
फिर शुरू हुआ भाषण भारी,
तर्क, आँकड़े, इतिहास पुराना,
साथ में आँसू, थोड़ी गाली,
और भविष्य का डर दिखाना।
भीड़ में कोई बच्चा बोला —
“चाचा, चोरी क्या होती है?”
चाचा बोले —
“जब वोट न मिले, वही तो होती है!”
कोई बोला —
“जनता नासमझ है!”
कोई बोला —
“जनता बहक गई!”
पर किसी ने यह नहीं कहा —
“शायद हमारी समझ ही थक गई।”
हवा में हाथ, ज़मीन पर पैर,
आँखों में साज़िश की धूल,
और हर हार के बाद
एक नया ‘चोरी’ वाला फूल।
रात को वही
टीवी स्टूडियो में बैठे,
एंकर से बोले —
“हम तो पहले से ही कहते!”
एंकर ने पूछा —
“सबूत है?”
बोले —
“सबूत? भावना है!”
तालियाँ बजीं, विज्ञापन आया,
और तर्क को लगी सजा है।
सुबह फिर वही चौराहा,
वही माइक, वही शोर,
और वही गिरधारी भटके हुए,
जिनके पास कुछ था ही नहीं चोर।
कविता यहीं हँसकर पूछती है —
अगर जेब ही खाली थी भाई,
तो चोरी कहाँ से हो गई
और इतनी आवाज़ क्यों मचाई?