राजीव वर्मा
ज़िंदगी से हुई एक खामोश बातचीत
ज़िंदगी से कभी बहुत कुछ नहीं माँगा मैंने,
न सोने का ताज, न हर दिन की जीत।
बस इतना चाहा कि
हर सुबह जागने की कोई वजह हो,
और हर रात सोते समय
दिल पर बोझ कम हो।
कभी उसने मुस्कान उधार दी,
कभी आँसू सौंप दिए।
कभी थाम लिया हाथ,
तो कभी अकेले चलना सिखा दिया।
पर हर दिन कुछ न कुछ देकर
मुझे थोड़ा और मज़बूत बना दिया।
एक सच्चे साथ की चाह
इस भीड़ भरी दुनिया में
बस एक ऐसा चेहरा चाहिए था
जिससे बात न भी हो
तो समझ बनी रहे।
जिसके सामने
कमज़ोर पड़ना शर्म न लगे।
मैंने दोस्ती माँगी थी,
पर किस्मत ने
दिलों की पूरी बारात भेज दी।
ऐसे लोग मिले
जो मेरी हँसी से ज़्यादा
मेरी चुप्पी समझते थे।
जब रिश्ते गिनती से बाहर हो जाएँ
कुछ रिश्ते अचानक नहीं आते,
वे धीरे–धीरे रगों में उतरते हैं।
पहले नाम बनते हैं,
फिर आदत,
और एक दिन
ज़रूरत।
जब दुनिया सवाल करती है,
तो ये लोग ढाल बन जाते हैं।
जब रास्ता टूटता है,
तो यही लोग
अपने कंधों से पुल बना देते हैं।
भरोसे की कसौटी
यहाँ विश्वास कोई तैयार माल नहीं,
जो पैकेट खोलते ही मिल जाए।
यहाँ भरोसा
वक़्त के चाकू से तराशा जाता है,
मुसीबत की आग में तपाया जाता है।
पहले हालात आज़माते हैं,
फिर इंसान।
और जो हर इम्तिहान में खरा उतर जाए,
उसी का नाम
दिल की फेहरिस्त में लिखा जाता है।
ये रिश्ते इत्र नहीं हैं
हमारे रिश्ते
खुशबू की शीशी जैसे नहीं,
जो दबाव में महक दें
और खाली हो जाएँ।
ये तो बारिश की तरह हैं—
गिरते भी हैं,
भीगते भी हैं,
और मिट्टी में मिलकर
नया जीवन उगा देते हैं।
जीवन की सबसे मजबूत ढाल
यह साथ
किसी काग़ज़ पर लिखा समझौता नहीं,
जिसे वक़्त फाड़ दे।
यह तो वो एहसास है
जो टूटने से पहले
हमें संभाल लेता है।
अगर ज़िंदगी थकाने लगे,
तो ये लोग
आराम बन जाते हैं।
अगर डर घेर ले,
तो यही लोग
हिम्मत की आवाज़ बनते हैं।
साथ—आज भी, कल भी
हम सिर्फ़ अच्छे दिनों के साथी नहीं,
हम बुरे वक़्त की पहचान हैं।
हम हँसी में भी साथ हैं,
और आँसुओं में भी बराबर के हिस्सेदार।
ये रिश्ता
सिर्फ़ साँसों तक सीमित नहीं,
यादों में भी ज़िंदा रहता है।
ज़िंदगी के साथ भी चलता है,
और ज़िंदगी के बाद भी
कहानियों में सांस लेता है।
अंतिम सत्य
क्योंकि कुछ लोग
ईश्वर का जवाब होते हैं
उन दुआओं का
जो हमने कभी ज़ोर से माँगी ही नहीं।