राजीव वर्मा
ज़िंदगी से हर दिन कोई तोहफ़ा नहीं माँगा हमने,
कभी मुस्कान मिली, कभी सब्र से काम लिया हमने।
कुछ लम्हे धूप बनकर आए, कुछ छाँव में ढल गए,
पर हर दिन जीने की वजह बनता चला गया।
बस एक सच्चे कंधे की चाह थी इस सफ़र में,
जिस पर सिर रखकर चुप हो सकें, भीड़ के शोर से परे।
पर किस्मत ने अकेले हाथ नहीं थामे हमारे,
उसने तो रिश्तों की पूरी क़तार सौंप दी सहारे।
यहाँ दोस्ती शर्तों में नहीं, भरोसे में बंधी है,
कोई पैकेट में भरोसा नहीं, ये तो वक़्त की कसौटी पर खरी है।
पहले साथ चलकर देखा जाता है हर मोड़ पर,
फिर दिल बिना सवाल किए सौंप दिया जाता है।
हमारे बीच रिश्ते इत्र की तरह नहीं,
जो दबाव में खुशबू दें और बोतल में ही खत्म हो जाएँ।
ये तो वो साँस हैं जो मुश्किल में भी चलती रहती हैं,
जो गिरने पर उठाती हैं, और थकने पर रुकने नहीं देतीं।
ये साथ कोई काग़ज़ी वादा नहीं है,
जिस पर दस्तख़त हों और वक़्त मिटा दे।
ये तो वो एहसास है
जो आज में भी जीता है और कल को भी संभाले।
अगर ज़िंदगी सवाल बन जाए,
तो ये लोग जवाब बनकर खड़े रहते हैं।
अगर रास्ता धुंधला हो जाए,
तो यही लोग उजाले की तरह आगे बढ़ते हैं।
हम साथ सिर्फ़ हँसी में नहीं,
खामोशी में भी बराबर के हिस्सेदार हैं।
आज की लड़ाई हो या कल की कहानी,
हर अध्याय में ये नाम बराबर लिखे हैं।
यह रिश्ता सिर्फ़ जीते-जी का नहीं,
यादों में भी साथ चलता है।
साँसों तक ही सीमित नहीं,
ये तो वजूद के बाद भी पहचाना जाता है।
क्योंकि कुछ लोग
ज़िंदगी से पहले मिलते हैं,
ज़िंदगी में साथ चलते हैं,
और ज़िंदगी के बाद भी
दुआ बनकर रह जाते हैं।