✨ कविता ✨अधूरे पन्ने

राजीव वर्मा

जीवन की डायरी से निकले कुछ अधूरे पन्ने

मैंने जीवन से कभी कोई बड़ी माँग नहीं रखी,
न यह कहा कि हर सुबह जीत के नाम हो,
न यह ज़िद की कि हर शाम ताली बजे।
बस इतना चाहा कि
जो मिले, वह सच्चा हो,
और जो जाए, वह सिखाकर जाए।

ज़िंदगी ने मेरी बात सुनी भी,
और अनसुनी भी की।
कभी उसने मेरी हथेली में
खुशी रख दी,
कभी मेरी हथेली को ही
सब्र में बदल दिया।

हर दिन एक नया अध्याय था,
कुछ अध्याय हँसते हुए खुले,
कुछ आँखें भिगोकर।
पर हर पन्ना
मुझे थोड़ा और इंसान बनाता गया।

साधारण इच्छाओं का असाधारण सफ़र

मुझे भीड़ नहीं चाहिए थी,
मुझे शोर नहीं चाहिए था।
बस एक ऐसा रिश्ता चाहिए था
जो बिना बुलाए पास बैठे,
जो बिना पूछे समझ जाए।

मैंने जब दोस्त माँगा,
तो नियति ने
नामों की नहीं,
दिलों की सूची थमा दी।
ऐसे लोग मिले
जो मेरी कामयाबी से ज़्यादा
मेरी थकान पहचानते थे।

जब साथ शब्द नहीं, एहसास बन जाए

कुछ लोग
आपके जीवन में प्रवेश नहीं करते,
वे धीरे-धीरे
आपकी साँसों की आदत बन जाते हैं।

उनसे रोज़ बात हो,
यह ज़रूरी नहीं,
पर उनसे बात न हो
तो दिन अधूरा लगता है।

वे लोग
आपके सुख में भी होते हैं,
पर असली पहचान
दुःख में देते हैं।

रिश्तों की वह भाषा जो शब्दों से परे है

हमारे बीच
कभी लंबे वादे नहीं हुए,
कभी भारी-भरकम क़समों की ज़रूरत नहीं पड़ी।

हम बस
एक-दूसरे के पास खड़े रहे,
जब हालात
पीछे हटने को कह रहे थे।

यही खड़ा रहना
धीरे-धीरे
भरोसे में बदल गया।

भरोसा: जो समय से गढ़ा जाता है

यहाँ विश्वास
किसी दुकान से खरीदी चीज़ नहीं,
यह तो
गलतफहमियों की धूप में सूखकर,
मुसीबतों की बारिश में भीगकर
तैयार होता है।

पहले हालात हमें परखते हैं,
फिर हम एक-दूसरे को।
और जो हर बार
टूटने के बाद भी
साथ चुनता है,
वही अपना कहलाता है।

रिश्ते जो इत्र नहीं, मिट्टी की खुशबू हैं

कुछ रिश्ते
दिखावे की तरह होते हैं—
दबाव पड़ते ही
महक देते हैं और खत्म हो जाते हैं।

पर हमारे रिश्ते
मिट्टी जैसे हैं—
गंदे भी होते हैं,
भारी भी,
पर जीवन उगाते हैं।

ये रिश्ते
गिरते हैं,
फिर उठते हैं,
फिर और मज़बूत होकर
चलने लगते हैं।

जब इंसान इंसान का कवच बन जाए

जब दुनिया
उँगलियाँ उठाती है,
तो यही लोग
कंधा आगे कर देते हैं।

जब आत्मविश्वास
दरारों में छिपने लगे,
तो यही लोग
हौसले की मरम्मत करते हैं।

ये साथ
किसी लिखित अनुबंध का मोहताज नहीं,
यह तो
दिल की मौन सहमति है।

रातों की खामोशी में भी जो साथ दे

हर रिश्ता
दिन के उजाले में अच्छा लगता है,
पर असली पहचान
रात के सन्नाटे में होती है।

जब प्रश्न
नींद छीन लें,
जब भविष्य
भारी लगे,
तब जो बिना कहे पास बैठे—
वही अपना होता है।

समय के साथ और समय के आगे

हमारा साथ
घड़ी की सुइयों से नहीं चलता,
यह तो
यादों की गति पर चलता है।

कुछ लोग
वर्तमान में होते हैं,
पर भविष्य तक साथ निभाते हैं।

और कुछ लोग
भले सामने न हों,
पर जीवन भर
भीतर रहते हैं।

अंत नहीं, एक शाश्वत सत्य

यह रिश्ता
सिर्फ़ जीते-जी का नहीं,
यह तो
कहानियों में चलता है,
यादों में सांस लेता है।

क्योंकि
कुछ लोग
ईश्वर द्वारा भेजा गया उत्तर होते हैं
उन प्रार्थनाओं का
जो हमने कभी शब्दों में ढाली ही नहीं।

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Rajeev Verma

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