राजीव वर्मा
जब दीपक की लौ भी थक जाती है,
जब सड़कों पर सन्नाटा उतर आता है,
तब वह भारी कदमों से दरवाज़ा खोलता है,
हाथों में दिनभर की थकान समेटे हुए।
दिन भर उसने सूरज से सौदे किए,
पसीने और खामोशी से जंग लड़ी,
अपने सपनों को जेब में मोड़कर रखा,
उन सपनों के लिए जो उसके नहीं थे।
घर सो चुका होता है उसके आने तक,
परदे गिर चुके होते हैं, चूल्हा ठंडा,
मेज़ पर चुपचाप उसका इंतज़ार करती हैं,
कुछ ठंडी रोटियाँ… बिना शिकायत।
वे सिर्फ आटे और आग से नहीं बनीं,
उनमें उसके टूटे हुए घंटे बसे हैं,
हर कौर में छुपा है दबा हुआ दर्द,
और होंठों पर टिकी हुई मजबूरी।
न कोई पूछता है, न कोई सुनता है,
दिनभर की कहानी अनकही रह जाती है,
उसका दिल अब चुप रहना सीख गया है,
जैसे मिट्टी के नीचे दबे हुए बीज।
पास के कमरों में बच्चे सपने बुनते हैं,
उन्हें क्या पता कीमत किसने चुकाई,
उनकी हँसी खरीदी गई है थकी आँखों से,
और अधूरी नींदों से।
वह उन ठंडी रोटियों से शिकायत नहीं करता,
क्योंकि त्याग की भाषा वह समझ चुका है,
रोज़-रोज़ वे उसे सिखाती हैं,
कि असली गर्माहट भीतर से आती है।
दुनिया तालियाँ उनके लिए बजाती है,
जो दिखते हैं, जो ऊँची आवाज़ में जीते हैं,
पर ईश्वर गिनता है हर खामोश बलिदान,
हर निभाया हुआ वादा।
तो रोटियाँ ठंडी ही सही,
भूख भी कुछ देर बैठी रहे,
जो प्रेम किसी और की साँसें चलाए,
वह हर दर्द से बड़ा होता है।
शायद किसी दिन चूल्हा जलेगा उसके लिए,
किसी की आँखें रास्ता देखेंगी,
पर तब तक वह शांति से खाता रहेगा,
जो प्रेम उसकी थाली में परोसा गया है।