राजीव वर्मा
वक्त धीरे-धीरे ही सही,
लेकिन बदलता जरूर है,
कभी रुक-रुक कर चलता है,
कभी चुपचाप सब कुछ कहता है।
जो आज बोझ सा लगता है,
जो आज साँसों पर भारी है,
कल वही याद बनकर पूछेगा—
क्या सच में इतना दुख था?
वक्त ने देखे हैं टूटते सपने,
सूनी आँखों की नमी भी देखी है,
उसने मुस्कानों को बिखरते देखा,
और उम्मीदों को फिर से जुड़ते भी।
जो हाथ आज खाली हैं,
वे कल कुछ थाम लेंगे,
जो रास्ते आज अँधेरे हैं,
उनमें भी दीपक जल उठेंगे।
वक्त हर घाव पर मरहम नहीं रखता,
पर दर्द को सहना सिखा देता है,
वह सवालों के जवाब नहीं देता,
पर जवाबों तक पहुँचना सिखा देता है।
कई बार लगता है,
जैसे कुछ भी नहीं बदला,
पर भीतर ही भीतर
हम पहले जैसे नहीं रहते।
जो कल अपनों से रूठे थे,
आज उन्हें समझने लगते हैं,
जो खुद से हार मान बैठे थे,
आज खुद से ही लड़ने लगते हैं।
वक्त ने सिखाया है चुप रहना,
जब शब्द साथ छोड़ देते हैं,
और इंतज़ार करना भी सिखाया है,
जब रास्ते साथ छोड़ देते हैं।
वह हर किसी को वही नहीं देता
जिसकी वह कामना करता है,
पर वही देता है,
जो उसे आगे बढ़ना सिखाता है।
आज जो आँसू बहते हैं,
वे कल ताकत बन जाते हैं,
आज जो रातें लंबी लगती हैं,
कल वही किस्से बन जाती हैं।
इसलिए जब मन टूटने लगे,
जब सब कुछ थम सा जाए,
तो याद रखना—
वक्त धीरे-धीरे ही सही,
लेकिन बदलता जरूर है।