राजीव वर्मा
“पूजा करने से धर्म का कोई भी संबंध नहीं है। धर्म का संबंध है शांत होने से, मौन होने से, शून्य होने से।”
यह कथन परंपरागत धार्मिक धारणाओं को चुनौती देता है, पर भीतर छुपे सत्य को उजागर करता है। अधिकांश लोग धर्म को मंदिर, मस्जिद, चर्च, मूर्ति, मंत्र और विधियों तक सीमित कर देते हैं। परंतु धर्म का मूल स्वरूप इन बाहरी क्रियाओं से कहीं गहरा, सूक्ष्म और आंतरिक है। धर्म कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था है।
पूजा करना एक क्रिया है; धर्म होना एक स्थिति। क्रिया समय में घटती है, स्थिति अस्तित्व में। आप पूजा करते हैं, फिर पूजा समाप्त हो जाती है; लेकिन यदि भीतर शांति उतर आए, तो वह हर क्षण आपके साथ रहती है। यही कारण है कि इतिहास में अनेक महापुरुष ऐसे हुए जिन्होंने किसी विधिवत पूजा के बिना भी जीवन को धर्ममय बना दिया। बुद्ध ने कहा—“अप्प दीपो भव”—स्वयं अपना दीपक बनो। उनका धर्म किसी मंदिर में नहीं, उनकी मौन चेतना में था।
धर्म का संबंध बाहरी आडंबर से नहीं, आंतरिक जागरूकता से है। जब मन शांत होता है, तब भीतर की अशांति—लोभ, क्रोध, भय, ईर्ष्या—धीरे-धीरे गलने लगती है। पूजा यदि मन को शांत नहीं करती, तो वह केवल एक आदत बनकर रह जाती है। सच्चा धर्म वही है जो मन को शांत करे, हृदय को कोमल बनाए और चेतना को विस्तृत करे।
मौन धर्म का गहन द्वार है। मौन का अर्थ केवल बोलना बंद करना नहीं, बल्कि विचारों के कोलाहल से मुक्त होना है। हम दिनभर बोलते कम हैं, सोचते अधिक हैं। यही निरंतर विचारों की भीड़ हमारे दुख का कारण बनती है। जब विचार थमते हैं, तब मौन प्रकट होता है। उस मौन में न ईश्वर की खोज करनी पड़ती है, न किसी सिद्धांत को पकड़ना पड़ता है—वहाँ केवल होना होता है।
शून्य होना धर्म की चरम अवस्था है। शून्य का अर्थ रिक्तता नहीं, बल्कि पूर्णता है। जब अहंकार, पहचान, अपेक्षाएँ और भय गिर जाते हैं, तब जो शेष रहता है वही शून्य है। वही शून्य करुणा है, प्रेम है, सत्य है। पूजा अक्सर अहंकार को मजबूत कर देती है—“मैं धार्मिक हूँ”, “मैं पूजा करता हूँ”—पर शून्य अहंकार को मिटा देता है।
आज धर्म को व्यापार, राजनीति और भय का साधन बना दिया गया है। लोग स्वर्ग के लोभ और नरक के डर से पूजा करते हैं। यह सौदा धर्म नहीं, मन की मजबूरी है। सच्चा धर्म भय से नहीं, समझ से जन्म लेता है। जब आप जीवन को गहराई से देखते हैं, तब करुणा स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है। किसी ग्रंथ के आदेश से नहीं, बल्कि भीतर की संवेदना से।
यदि पूजा से ही धर्म आता, तो पूजा करने वाले कभी क्रूर न होते। पर इतिहास साक्षी है कि सबसे अधिक हिंसा धर्म के नाम पर हुई है। इसका कारण यह है कि पूजा ने मन को नहीं बदला, केवल पहचान दी। मन वही रहा—लोभी, आक्रामक, विभाजक। धर्म का अर्थ है मन का रूपांतरण, न कि पहचान का विस्तार।
धर्म का अर्थ है जीवन के प्रति सजगता। जब आप चलते हैं, खाते हैं, बोलते हैं—सब कुछ जागरूकता से करते हैं, वही धर्म है। जब आप किसी को देखते हैं और उसमें स्वयं को देखते हैं, वही धर्म है। जब आप बिना शर्त सुनते हैं, बिना निर्णय के स्वीकार करते हैं, वही धर्म है। इसमें किसी मंदिर की आवश्यकता नहीं।
शांत मन में ही सत्य उतरता है। अशांत मन सत्य को विकृत कर देता है। इसलिए ध्यान, मौन और सजगता को सभी आध्यात्मिक परंपराओं में केंद्रीय स्थान मिला है। ध्यान पूजा नहीं है; ध्यान जागरण है। ध्यान में आप कुछ माँगते नहीं, आप कुछ बनते भी नहीं—आप बस जो हैं, उसे देखते हैं।
धर्म कोई नियमों की सूची नहीं, बल्कि जीवन की सुगंध है। फूल पूजा नहीं करता, फिर भी उसकी सुगंध चारों ओर फैलती है। नदी किसी ग्रंथ को नहीं मानती, फिर भी वह प्यास बुझाती है। सूर्य किसी मंत्र का जाप नहीं करता, फिर भी वह प्रकाश देता है। यही धर्म है—स्वाभाविक, सहज और मौन।
जब मन शांत होता है, तो नैतिकता अपने आप जन्म लेती है। तब आपको सत्य बोलने का आदेश नहीं देना पड़ता, सत्य स्वतः बहता है। तब आपको अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ाना पड़ता, हिंसा असंभव हो जाती है। धर्म अनुशासन नहीं, स्वाभाविकता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि आप पूजा करते हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या आप शांत हैं? क्या आप भीतर से मौन हैं? क्या आप शून्य होने का साहस रखते हैं? यदि हाँ, तो आप धर्म में हैं—चाहे आप किसी भी नाम, रूप या परंपरा से हों।
अंततः धर्म कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक अवस्था है—जाग्रत, शांत और करुणामय होने की अवस्था। जब पूजा गिर जाती है और शांति उतर आती है, तब धर्म जन्म लेता है। और वही धर्म संसार को बदलने की शक्ति रखता है—बिना शोर के, बिना प्रचार के, केवल मौन की गहराई से।