तनाव से मुक्त होकर जीवन को समझने की कला

राजीव वर्मा

“कुछ भी स्थायी नहीं है, अपने आपको बहुत अधिक तनाव न दें, क्योंकि स्थिति चाहे कितनी भी खराब हो, यह बदल जाएगी।”
यह वाक्य सुनने में सरल लगता है, पर इसके भीतर जीवन का सबसे गहरा और सच्चा दर्शन छिपा है। मानव जीवन दुख-सुख, सफलता-असफलता, उतार-चढ़ाव और आशा-निराशा के बीच निरंतर गतिशील रहता है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा — यही परिवर्तन का शाश्वत नियम है।

हमारा अधिकांश तनाव इस भ्रम से जन्म लेता है कि वर्तमान परिस्थिति हमेशा बनी रहेगी। जब दुख आता है, तो हमें लगता है कि यह अंतहीन है; और जब सुख आता है, तो हम उसे पकड़कर रखने की कोशिश करते हैं। पर प्रकृति न किसी को स्थायी दुख देती है, न स्थायी सुख। समय हर चीज़ को बदल देता है — मौसम, रिश्ते, हालात और स्वयं हमें भी।

इतिहास और प्रकृति दोनों इसके साक्षी हैं। जो साम्राज्य कभी अजेय लगते थे, वे समय के साथ मिट्टी में मिल गए। जो लोग असहाय और कमजोर समझे जाते थे, वही आगे चलकर इतिहास रच गए। रात चाहे कितनी भी अंधेरी क्यों न हो, सुबह का आना तय है। यही कारण है कि हमें कठिन समय में धैर्य और अच्छे समय में विनम्रता सीखनी चाहिए।

तनाव तब बढ़ता है जब हम परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपनी अपेक्षाओं से लड़ने लगते हैं। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी योजना के अनुसार चले, हमारे समय पर बदले, हमारी इच्छा से सुधरे। लेकिन जीवन किसी एक व्यक्ति की सुविधा के अनुसार नहीं चलता। जब हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब तनाव धीरे-धीरे कम होने लगता है।

भारतीय दर्शन में ‘अनित्य’ का सिद्धांत बार-बार दोहराया गया है। बुद्ध ने कहा था कि दुख का कारण आसक्ति है — हम चीज़ों, लोगों और परिस्थितियों से इतना जुड़ जाते हैं कि उनके बदलने से टूट जाते हैं। यदि हम यह समझ लें कि हर स्थिति अस्थायी है, तो न दुख हमें तोड़ पाएगा, न सुख हमें अहंकारी बनाएगा।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम प्रयास करना छोड़ दें या परिस्थितियों को बदलने की कोशिश न करें। इसका अर्थ केवल इतना है कि हम प्रयास करते समय अपने मन को बोझिल न बनाएं। कर्म करें, लेकिन परिणाम को लेकर स्वयं को यातना न दें। जब हम पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो परिवर्तन अपने समय पर स्वयं आता है।

तनाव से मुक्त होने का एक सरल उपाय है — वर्तमान में जीना। अतीत की गलतियों पर पछतावा और भविष्य की आशंकाओं में उलझकर हम अपने आज को खराब कर लेते हैं। जबकि सच यह है कि हमारे पास केवल यही क्षण है। जो आज सही किया जाएगा, वही कल को बेहतर बनाएगा।

कठिन परिस्थितियाँ हमें तोड़ने नहीं, बल्कि गढ़ने आती हैं। वे हमें धैर्य, सहनशीलता और आत्मबल सिखाती हैं। जो व्यक्ति हर संकट में यह याद रखता है कि “यह भी गुजर जाएगा”, वही भीतर से मजबूत होता चला जाता है। समय के साथ वही व्यक्ति सबसे अधिक संतुलित और परिपक्व बनता है।

तनाव हमारे मन और शरीर दोनों को कमजोर करता है। लगातार चिंता में रहने से न केवल मानसिक शांति जाती है, बल्कि स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। इसलिए जब भी मन भारी लगे, एक पल रुकें, गहरी साँस लें और स्वयं से कहें — “यह स्थिति स्थायी नहीं है।” यह एक वाक्य आपके भीतर आशा का दीप जला सकता है।

जीवन नदी की तरह है — बहाव को रोकना हमारे हाथ में नहीं, पर तैरना सीखना हमारे हाथ में है। यदि हम हर लहर से डरते रहेंगे, तो डूब जाएंगे; लेकिन यदि हम विश्वास रखें कि लहरें बदलती हैं, तो हम पार भी पहुँच सकते हैं।

अंततः जीवन का सार यही है कि हम परिवर्तन को स्वीकार करें, स्वयं पर अनावश्यक दबाव न डालें और हर परिस्थिति में सीखते रहें। याद रखें, कोई भी रात इतनी लंबी नहीं होती कि सुबह न आए, और कोई भी दुख इतना स्थायी नहीं होता कि जीवन को रोक दे।

इसलिए स्वयं को अत्यधिक तनाव में न डालें। स्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों न लगे, वह बदलेगी जरूर। जैसे समय ने पहले बदला है, वैसे ही आगे भी बदलेगा। और जब आप यह समझ लेते हैं, तो जीवन हल्का, शांत और कहीं अधिक सुंदर हो जाता है।

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Rajeev Verma

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