राजीव वर्मा
दुःख शोक जब जो आ पड़े,
तो धैर्य का दीप जलाए रखो,
आँधियाँ आएँ, तूफ़ान घिरें,
मन की लौ को बुझने न दो।
जीवन की राहें सरल नहीं हैं,
कदम-कदम पर काँटे मिलते हैं,
जो ठहर गए भय और संशय में,
वे अपने ही लक्ष्य से गिरते हैं।
सहनशीलता की ढाल उठाकर,
आगे बढ़ते जाना सीखो,
क्षणिक पीड़ा, क्षणिक हार को
जीवन का अंत न मानो।
जिस मिट्टी में आँसू गिरते हैं,
वहीं से पुष्प खिले करते हैं,
रात जितनी भी गहरी क्यों न हो,
सवेरा उसी से निकलते हैं।
कर्तव्य-पथ वह तीर्थ है,
जहाँ हर यात्री तपता है,
जो स्वार्थ त्यागकर चलता है,
वही अंत में निखरता है।
न अपमान से मन डगमगाए,
न प्रशंसा से मद हो जाए,
जो समभाव में स्थिर रहता है,
वही सच्चा विजयी कहलाए।
जब श्रम थकान बन जाए बोझ,
और आशा धुंधली होने लगे,
तब याद रखो—हर प्रयास
किसी न किसी दिन रंग चढ़े।
जो गिरकर भी फिर उठ खड़ा हो,
उससे बड़ा वीर कौन हुआ,
जिसने दुख में भी धर्म न छोड़ा,
उससे बड़ा धीर कौन हुआ।
सफलता केवल शिखर नहीं,
सफलता है चलना सत्य के संग,
हर दिन स्वयं से जीतते जाना,
यही जीवन का सुंदर रंग।
इसलिए दुःख शोक जब भी आए,
तो धैर्य से सब कुछ सहना सीखो,
होगी सफलता, यह निश्चित है—
बस कर्तव्य-पथ पर दृढ़ रहो।