राजीव वर्मा
तकलीफ़ें तो वाई-फाई जैसी होती हैं,
आज जुड़ीं, कल अपने-आप छूटीं,
दो चार रिस्टार्ट में याद भी न आएँ,
ज़िंदगी आगे बढ़ी, शिकायतें रूठीं।
मगर जो जानबूझकर दर्द दे जाए,
वो पॉप-अप ऐड सा पीछा न छोड़े,
क्रॉस बटन दबाओ, तब भी उछलकर कहे—
“अभी कहाँ गए? मैं फिर आऊँ थोड़े!”
कुछ लोग मौसम से भी तेज़ बदलते हैं,
सुबह धूप, दोपहर में तूफ़ान,
पूछो तो बोले—“मैं ऐसा ही हूँ”,
जैसे आदत नहीं, कोई वरदान!
ऐसे इंसान पर भरोसा रखना,
वैसा ही है जैसे चाय में नमक,
हर घूँट पर सोचोगे—
“गलती मेरी थी या किस्मत का धमक?”
फितरत जिनकी बदलना हो,
वो टिकते नहीं किसी मोड़ पर,
न दोस्ती उनकी स्थायी होती,
न वादे चलते हैं बोर्ड पर।
समय भी बदले, ये मान लिया,
पर वो भी सिखा जाता है सब्र,
इंसान जो हर पल रंग बदले,
वो तो गिरगिट का रिश्तेदार अब!
तो सीख यही है, हँसते-हँसते,
दर्द भूलो, ड्रामा छोड़ो भाई,
जो जानकर दुख दे, या रोज़ बदल जाए—
उससे दूरी ही सबसे बड़ी कमाई !