राजीव वर्मा
“ठंडी रोटियाँ अक्सर उसी के हिस्से में आती हैं जो अपनों के लिए कमाकर देर से घर लौटता है।”
यह पंक्ति केवल सामाजिक यथार्थ नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संकेत भी है। जीवन के बाहरी स्तर पर यह वाक्य त्याग, परिश्रम और उपेक्षा की कहानी कहता है, किंतु भीतर के स्तर पर यह कर्म, वैराग्य और साधना का मौन उपदेश देता है। जो व्यक्ति अपनों के लिए अपने सुख, समय और इच्छाओं का त्याग करता है, वह अनजाने में ही एक आध्यात्मिक यात्रा पर चल पड़ता है।
जो देर से घर लौटता है, वह केवल समय में नहीं, चेतना में भी एक दूरी तय करता है। दिन भर का श्रम उसके शरीर को थका देता है, पर मन को अनुशासित करता है। जब उसे ठंडी रोटियाँ मिलती हैं, तब वे केवल भोजन नहीं होतीं, वे उसकी साधना का प्रसाद बन जाती हैं। जैसे संन्यासी भूख और कष्ट को स्वीकार कर आत्मबल बढ़ाता है, वैसे ही यह गृहस्थ अपने कर्तव्य को निभाते हुए भीतर ही भीतर तप करता है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में कर्मयोग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं—“निष्काम कर्म करो।” ठंडी रोटियाँ उसी निष्काम कर्म का प्रतीक हैं। जो व्यक्ति यह अपेक्षा नहीं करता कि उसकी मेहनत का तुरंत सम्मान मिले, जो बिना शिकायत अपने हिस्से का कर्तव्य निभाता है, वह भीतर से मजबूत होता चला जाता है। उसकी आत्मा विस्तार पाती है, भले ही बाहरी संसार उसे अनदेखा कर दे।
ठंडी रोटियाँ हमें अस्थायित्व का बोध कराती हैं। गरम रोटी का सुख क्षणिक है, पर उसे पाने की प्रतीक्षा स्थायी नहीं रहती। इसी प्रकार संसार के सुख भी क्षणभंगुर हैं। देर से लौटने वाला व्यक्ति जब ठंडी रोटी खाता है, तो अनजाने में ही वह इस सत्य से परिचित होता है कि जीवन में हर सुख हमारी सुविधा के अनुसार नहीं मिलता। यह स्वीकार्यता उसे भीतर से शांत बनाती है, और यही शांति आध्यात्मिक उन्नति का द्वार है।
यह भी एक गहरा सत्य है कि जो दूसरों के लिए जीता है, वह स्वयं के अहंकार को धीरे-धीरे खो देता है। ठंडी रोटियाँ अहंकार को गलाने का कार्य करती हैं। वे यह सिखाती हैं कि “मैं” से बड़ा “हम” है। अपनों के लिए देर तक काम करना, बिना किसी शिकायत के परिस्थितियों को स्वीकार करना—यह सब आत्मिक परिष्कार की प्रक्रिया है। ऐसा व्यक्ति चाहे मंदिर न जाए, ध्यान न करे, फिर भी उसका जीवन एक मौन साधना बन जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो घर ही उसका आश्रम बन जाता है और काम ही उसकी पूजा। देर से लौटना उसका व्रत है और ठंडी रोटियाँ उसकी परीक्षा। यदि वह इस परीक्षा में खिन्न न होकर कृतज्ञ बना रहता है, तो उसके भीतर करुणा, सहनशीलता और संतोष का जन्म होता है। यही गुण किसी भी साधक को आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं।
हालाँकि आध्यात्मिकता यह नहीं सिखाती कि उपेक्षा को आदर्श बना लिया जाए। परिवार और समाज का कर्तव्य है कि त्याग करने वाले को सम्मान और स्नेह दें। पर जब ऐसा न भी मिले, तब भी जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता, वह भीतर से ऊँचा उठता है। उसकी आत्मा जानती है कि उसका परिश्रम व्यर्थ नहीं है; वह किसी गहरे संतुलन का हिस्सा है।
अंततः, ठंडी रोटियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि सच्ची गर्माहट बाहर नहीं, भीतर होती है। जो अपनों के लिए जलता है, तपता है, वही भीतर से प्रकाशित होता है। संसार चाहे उसे ठंडा भोजन दे, पर उसकी आत्मा में संतोष की अग्नि जलती रहती है। और वही अग्नि उसे जीवन के साधारण कर्मों के बीच भी आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँचा देती है।