तर्क करो, पाखण्ड नहीं — विज्ञान, विश्वास और मानवीय जिज्ञासा

राजीव वर्मा

मनुष्य का विकास उसकी जिज्ञासा, तर्कबुद्धि और सत्य की खोज से हुआ है। मानव सभ्यता ने हजारों वर्षों में अनगिनत विश्वास, धारणाएँ और कल्पनाएँ विकसित कीं। परंतु इन सबके बीच एक शक्ति ऐसी रही जिसने मानव को हमेशा आगे बढ़ाया—और वह है तर्क, अन्वेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

इसी संदर्भ में यह पंक्तियाँ बहुत सारगर्भित हैं:

“चाँद दिखता है, इसलिए वैज्ञानिक वहाँ गए।
यदि स्वर्ग और नरक दिखता तो वैज्ञानिक वहाँ भी अवश्य जाते। तर्क करो, पाखण्ड नहीं।”

ये पंक्तियाँ मनुष्य की सोच, धार्मिक मान्यताओं, वैज्ञानिक पद्धति, और सत्य की खोज के वास्तविक स्वरूप को गहराई से छूती हैं। आइए इसे विस्तार से समझें।

1. चाँद दिखता है, इसलिए वैज्ञानिक वहाँ गए

चाँद सदियों से मानव का साथी रहा है। वह हर रात आकाश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। प्राचीन सभ्यता से लेकर आज के वैज्ञानिक युग तक—सबने चाँद को देखा, समझा, और उसके बारे में जिज्ञासा पाई।

दृश्यता + प्रमाण + जिज्ञासा = अन्वेषण

चाँद दिखाई देता है, उसके बारे में हम दूरबीन से तथ्य प्राप्त कर सकते हैं, उसकी सतह का निरीक्षण कर सकते हैं, उसकी दूरी माप सकते हैं—यही वैज्ञानिक प्रयास का आधार है।

* चंद्रमा की गति देखी जा सकती है

* उसका आकार बदलते हुए हम देख सकते हैं

* ग्रहण होते हुए चाँद की वैज्ञानिक व्याख्या मिलती है

अर्थात्, चाँद का अस्तित्व प्रमाणित है।

यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने उस पर जाने की योजना बनाई, तकनीक विकसित की, और 1969 में मनुष्य पहली बार चाँद पर पहुँचा।

यह घटना मानव इतिहास का एक मील का पत्थर बनी—क्योंकि यह देखने, परखने और सत्य खोजने की क्षमता का परिणाम था।

2. यदि स्वर्ग-नरक दिखता, तो वैज्ञानिक वहाँ भी अवश्य जाते

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—स्वर्ग और नरक को कोई देख नहीं सकता, वे सिर्फ धार्मिक ग्रंथों, लोककथाओं, और विश्वासों में वर्णित हैं। वे हमारी कल्पना या आध्यात्मिक अवधारणाएँ अधिक हैं, वास्तविक वैज्ञानिक संरचनाएँ नहीं।

यदि किसी वस्तु का आश्रय—

* दृश्य अनुभव

* प्रमाण

* परख

* परीक्षण

* मापन

—इन सब पर हो, तो वह वैज्ञानिक अन्वेषण के योग्य बन जाती है।

लेकिन स्वर्ग और नरक जैसी अवधारणाओं का कोई भौतिक अस्तित्व सिद्ध नहीं है। कोई उपग्रह, दूरबीन, तकनीक या उपकरण उन्हें नहीं खोज पाया। उनके बारे में जो भी विचार हैं, वे अंधविश्वास या आध्यात्मिक मत हैं—प्रमाण आधारित वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

इसलिए वैज्ञानिक वहाँ नहीं गए, क्योंकि जहाँ प्रमाण नहीं, वहाँ विज्ञान नहीं।

यदि कल को कोई प्रमाण, कोई संकेत, कोई भौतिक संरचना मिल जाए—विज्ञान निश्चित ही उसकी खोज करेगा। विज्ञान का रास्ता खुला हुआ है। वह किसी भी सत्य की खोज करने को तत्पर रहता है।

3. विज्ञान और पाखण्ड — मूल अंतर

विज्ञान का आधार –

* प्रमाण

* पुनरावृत्ति

* निरीक्षण

* परीक्षण

* तर्क

* पाखण्ड का आधार

* डर

* अंधविश्वास

* परंपरा

* कल्पना

* भावनाओं का दुरुपयोग

विज्ञान कहता है—
“सत्य स्वीकार करो, चाहे वह कैसा भी हो।”

पाखण्ड कहता है—
“जो कहा गया है, वही मान लो, भले वह प्रमाणहीन हो।”

विज्ञान कहता है—
“प्रश्न पूछो।”

पाखण्ड कहता है—
“प्रश्न पूछना पाप है।”

इसीलिए लेखक ने कहा—तर्क करो, पाखण्ड नहीं।

4. मनुष्य का विकास तर्क की वजह से हुआ है

आज हम—

* चाँद पर जा सके

* मंगल पर रोवर भेज सके

* समंदर की गहराइयाँ नाप सकें

* रोगों का इलाज खोज सकें

* कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट बना सकें

ये सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि मनुष्य ने तर्क अपनाया।

यदि मनुष्य केवल पाखण्ड और कल्पनाओं में उलझा रहता, तो वह कभी आगे नहीं बढ़ पाता।
विकास केवल सोचने, जिज्ञासा रखने, और प्रमाण आधारित निर्णय लेने से संभव होता है।

5. धार्मिक मान्यताओं का सम्मान, पर अंधविश्वास का विरोध

यह भी महत्वपूर्ण है कि आध्यात्मिकता और धर्म का अपना स्थान है। वे जीवन को नैतिकता, अनुशासन और भावनात्मक संतुलन देते हैं।
लेकिन जब धर्म के नाम पर—

* डर फैलाया जाए,

* विवेक समाप्त किया जाए,

* असत्य को सत्य की तरह परोसा जाए,

* तर्क को दबाया जाए,

तब वह पाखण्ड बन जाता है।

हमारी संस्कृति कहती है—“सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है।”
सत्य की खोज तभी हो सकती है जब तर्क किया जाए।

6. आधुनिक समय में तर्क की आवश्यकता

आज का समय सूचना क्रांति का है।
फिर भी अंधविश्वास का अंधकार अभी भी फैला हुआ है—

* ग्रह-नक्षत्रों से डर

* टोने-टोटके

* झूठे चमत्कार

* बाबाओं/गुरुओं द्वारा शोषण

* दैवीय भय दिखाकर धन उगाहना

इन्हें रोकने का एक ही उपाय है—तर्कपूर्ण सोच।

जब समाज तर्कशील बनता है, तब—

* शिक्षा का स्तर बढ़ता है

* समानता बढ़ती है

* विज्ञान प्रगति करता है

* मानव शोषण समाप्त होता है

7. निष्कर्ष — तर्क ही मानवता का मार्ग है

इन पंक्तियों का गहरा अर्थ है—

“जो दिखता है, जिसे परखा जा सकता है, वही सत्य की राह है।”
“यदि स्वर्ग-नरक दिखते, वैज्ञानिक वहाँ भी चले जाते।”
“पर जहाँ प्रमाण नहीं, वहाँ विश्वास के नाम पर पाखण्ड नहीं होना चाहिए।”

विज्ञान और तर्क हमें सोचने की स्वतंत्रता देते हैं।
पाखण्ड हमें बंधनों में जकड़ता है।

मनुष्य का वास्तविक मार्ग है—
प्रमाण, तर्क, जिज्ञासा और सत्य की खोज।

इसी से मानव सभ्यता आगे बढ़ी है, और आगे भी बढ़ेगी।

Published by

Unknown's avatar

Rajeev Verma

Thanks For watching. Note:- ALL THE IMAGES/PICTURES SHOWN IN THE VIDEO BELONGS TO ME. I AM THE OWNER OF ANY PICTURES SHOWED IN THE VIDEO ! DISCLAIMER: This Channel DOES NOT Promote or encourage Any illegal activities , neither any services of any child is taken in this video making, all contents provided by this Channel is meant for Sharing Knowledge and awareness for health only . Rajeev Verma #HealthyFeasting. I Loves to post videos on Preventive Health Maintenance Food Recipes. Subscribe my YouTube Channel NOW. http://www.youtube.com/c/HealthyFeasting

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.