राजीव वर्मा
क्षमा वो फूल है, कोमल-सा,
जिसमें प्रेम की शीतल-सी छाँव,
जिसे रौंद दे दुनिया चाहे,
फिर भी महक न जाए ठहराव।
दुख की धूल पड़े जिस पर,
वो और सुगंधित हो जाता है,
जिसे चोट मिले जीवन से,
वो और दिव्य हो जाता है।
क्रोध जला दे भीतर–भीतर,
द्वेष अँधेरा बन जाता है,
पर क्षमा का छोटा-सा दीप
हर पीड़ा को हर जाता है।
जिस मन में क्षमा की धार बहे,
वहाँ कलुष कभी ठहरता नहीं,
जहाँ प्रेम की लौ जगती हो,
वहाँ अंधकार ठहरता नहीं।
जो दिल क्षमा को चुन लेता,
वो खुद ही प्रकाश बन जाता,
कुचले फूलों-सी उसकी महक
दूर–दूर तक फैल जाती।
जीवन का सच्चा सौंदर्य है,
बिना शर्त प्रेम का प्रवाह,
क्षमा वही मधुर सुगंध है
जो दे जाए जग में चाह–बचाह।