राजीव वर्मा
मानव जीवन केवल जन्म-मृत्यु के बीच की एक यात्रा नहीं है; यह स्वयं को पहचानने, समझने और भीतर की संभावनाओं को जागृत करने की एक अद्भुत प्रक्रिया है। हमारे आसपास जो यह विशाल अस्तित्व है—ब्रह्मांड, प्रकृति, चेतना—यह केवल निर्जीव व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीता-जागता, संवेदनशील, ऊर्जा से भरा हुआ तंत्र है। यह अस्तित्व केवल हमें जीवन देने तक सीमित नहीं है; यह लगातार हमें जगाने, हमें खिलाने, और हमें पूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास करता है।
लेकिन दुखद सत्य यह है कि मनुष्य अक्सर अपने ही मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।
आइए इस सचाई को गहराई से समझें।
1. अस्तित्व की चिंता — एक दार्शनिक दृष्टिकोण
जब कहा जाता है कि “अस्तित्व तुम्हारी चिंता करता है”, इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्मांड किसी मानव माता-पिता की तरह तुम्हारे हर कदम पर निगरानी कर रहा है। इसका मतलब यह है कि जीवन का मूल स्वभाव जागरण, आनंद, और विकास है।
जिस तरह एक बीज में पेड़ बनने की पूरी संभावना होती है, उसी तरह प्रत्येक इंसान के भीतर चेतना के फूल खिलने की क्षमता है।
अस्तित्व इसी संभावना को पूरा करने में सहायता करता है:
– वह अवसर देता है,
– संकेत भेजता है,
– अनुभव कराता है,
– धकेलता है,
– कभी थपथपाता है,
– कभी झकझोरता है।
हर चुनौती, हर खुशी, हर घटना—सब हमें आगे बढ़ाने के लिए होती है।
* अस्तित्व चाहता है कि तुम अपनी जिंदगी में अंधकार से बाहर निकलो,
* तुम भीतर सोई चेतना को जगाओ,
” तुम जीवन का आनंद अनुभव करो,
* तुम अपने भीतर के संगीत को पहचानो।
इसी भावना से उपजी पंक्तियाँ हैं—
“अस्तित्व का पूरा-पूरा प्रयास है कि तुम भी जागो, तुम भी आनंदित होओ,
कि तुम्हारे जीवन में भी गीत जगे, कि तुम्हारे प्राणों में भी बांसुरी बजे!”
यहाँ बांसुरी बजना प्रतीक है—
* शांति का,
* प्रेम का,
* जागरण का,
* संतोष का,
और
* आत्मिक संगीत का।
जीवन चाहता है कि तुम भी वही दिव्यता अनुभव करो जो संतों, कवियों, ऋषियों और जागृत आत्माओं ने अनुभव किया है।
2. समस्या कहाँ है ? मानव स्वयं अपना दुश्मन क्यों ?
सबसे कठोर और सबसे सच्चा हिस्सा है—
“मगर तुम ही अपने दुश्मन हो, तुमसे बड़ा कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है।”
* मनुष्य के सामने सबसे बड़ा विरोधी बाहरी दुनिया नहीं,
* कोई व्यक्ति नहीं,
* कोई परिस्थिति नहीं,
* बल्कि वह स्वयं है।
यहाँ कई स्तर हैं जहाँ मनुष्य खुद को रोकता है—
(i) मन की अज्ञानता और भ्रम
मन अनगिनत भ्रम पैदा करता है—
* “मैं नहीं कर सकता।”
* “मेरी किस्मत खराब है।”
* “दूसरे मुझसे आगे हैं।”
* “क्या फायदा?”
ये विचार अस्तित्व के दिए अवसरों को ढक देते हैं।
(ii) अहंकार — सबसे बड़ा शत्रु
अहंकार इंसान को जकड़ लेता है।
यह कहता है—
* “मुझे कुछ नया नहीं सीखना।”
* “मैं जैसा हूँ सही हूँ।”
* “मुझे बदलने की आवश्यकता नहीं।”
अहंकार ही वह दीवार है जो आदमी को सत्य से दूर रखती है।
(iii) भय — जागरण का सबसे बड़ा अवरोध
मनुष्य अपनी आदतों, आराम और पुराने ढर्रे में सुरक्षित महसूस करता है। जागरण डरावना लगता है क्योंकि इसके लिए परिवर्तन चाहिए, और परिवर्तन दर्द देता है।
यही भय उसे पीछे रोकता है।
(iv) वासना और इच्छाओं का जाल
मन हमेशा कुछ न कुछ चाहता है—
* अधिक पैसा,
* अधिक पहचान,
* अधिक सम्मान,
* अधिक सुविधा।
यह निरंतर दौड़ मन को भटकाए रखती है। जब मन बाहर दौड़ता है, भीतर बांसुरी कैसे बजेगी ?
3. जागरण: अस्तित्व की सबसे बड़ी पुकार
अस्तित्व का संदेश स्पष्ट है—
– जागो।
– स्वयं को पहचानो।
– अपने भीतर के आनंद को महसूस करो।
जागरण का अर्थ है—
– जीवन को जागरूकता से जीना
– हर क्षण में उपस्थित रहना
– अपने विचारों पर नियंत्रण रखना
– अनावश्यक दुखों से मुक्त होना
– अपने अंतरात्मा से संवाद करना
जब व्यक्ति जागता है, तब—
– दुख घटते हैं
– भय टूटता है
– स्पष्टता आती है
– प्रेम बढ़ता है
और
– जीवन एक उत्सव बन जाता है
उसी क्षण “गीत” उत्पन्न होते हैं, उसी क्षण “बांसुरी” बजती है।
4. जीवन में बांसुरी का अर्थ
बांसुरी बजना एक प्रतीकात्मक भाषा है।
इसका वास्तविक अर्थ है—
– जीवन में सद्भावना
– भीतर पूर्ण शांति
– मन का निर्मल होना
– प्रेम की गहराई
– मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
जब किसी व्यक्ति के भीतर यह संगीत जगता है,
वह साधारण नहीं रहता।
वह बदल जाता है—विचारों में, व्यवहार में, व्यक्तित्व में।
उसकी उपस्थिति से भी वातावरण में शांति फैलती है।
5. हम खुद को कैसे रोकते हैं ?
कुछ विशेष तरीके हैं जिनसे मनुष्य स्वयं अपने विकास को रोकता है—
• टालमटोल (Procrastination)
मन हमेशा कहता है—
“कल देखेंगे…”
और यही टालना जीवन को बेमतलब बनाता है।
• आत्म-आलोचना
लोग अपना सबसे बड़ा अपमान खुद करते हैं—
“मैं बेकार हूँ”, “मैं किसी लायक नहीं”।
यह विचार आत्मा को कुचल देते हैं।
• नकारात्मक लोगों की संगति
नकारात्मकता व्यक्ति की आभा को जला देती है।
ऐसे लोग हमें पीछे खींचते हैं।
• अतीत का बोझ
अतीत की गलतियाँ, दुख, शर्म—
ये आज की ऊर्जा को नष्ट कर देती हैं।
6. समाधान: अपने ही भीतर मित्र बनना
जब तक इंसान खुद से युद्ध करता रहेगा,
वह संसार में शांति कहाँ पा सकेगा?
जीवन बदलना है तो पहले स्वयं का मित्र बनना पड़ेगा।
कैसे?
1. स्वयं को स्वीकार करें
स्वीकृति जागरण की पहली सीढ़ी है।
जब व्यक्ति खुद को जैसे है वैसे स्वीकार कर लेता है, तभी परिवर्तन संभव होता है।
2. ध्यान और जागरूकता
ध्यान मन को साफ करता है।
जागरूकता जीवन में स्पष्टता लाती है।
यह वही ‘चाबी’ है जो आंतरिक बांसुरी को खोलती है।
3. नकारात्मक विचारों को छोड़ें
जो बातें आपकी ऊर्जा खाती हैं, उनसे मुक्ति पाएं।
अपने मन को हर दिन नए, स्वच्छ विचार दें।
4. अहंकार को ढीला करें
अहंकार जितना कम होगा, जीवन उतना ही सहज होगा।
नम्रता ही सच्ची शक्ति है।
5. प्रकृति से जुड़ें
अस्तित्व से जुड़ने का सबसे सरल तरीका है—
प्रकृति में समय बिताना।
प्रकृति हमें स्थिर, शांत और सचेत करती है।
6. निष्कर्ष — अस्तित्व का गीत तुम्हारे भीतर है
ब्रह्मांड तुम्हें आगे पुकार रहा है,
तुम्हें जागरण की ओर ले जाना चाहता है।
वह चाहता है कि—
– तुम भी आनंदित हो,
– तुम भी प्रसन्न हो,
– तुम भी पूर्णता का स्वाद चखो।
लेकिन रास्ते में केवल तुम ही खड़े हो। तुम्हारी सोच, तुम्हारे भय, तुम्हारी सीमाएँ—इन्हें पार कर लोगे तो जीवन एक उत्सव बन जाएगा।
अस्तित्व चाहता है कि तुम्हारे भीतर भी संगीत बजे,
और जो मनुष्य अपने भीतर का संगीत सुन लेता है,
वह संसार को भी संगीत दे देता है।
याद रखें—
– दुश्मन बाहर नहीं है,
– दुश्मन भीतर है।
– और मित्र भी भीतर ही बैठा है।
जागो,
– अपने भीतर के मित्र को खोजो,
– और अस्तित्व से तालमेल मिलाकर जीवन में बांसुरी का मधुर संगीत जगाओ।