मौन मृत्यु: जब इंसान सोचना और बोलना छोड़ देता है

राजीव वर्मा


जीवन केवल सांसें लेने का नाम नहीं है। जीवन वह है जो हम सोचते हैं, जो हम महसूस करते हैं, और जो हम कहने और करने का साहस रखते हैं। एक इंसान शारीरिक रूप से केवल एक बार मरता है — लेकिन मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से वह कई बार मर सकता है। पंक्तियाँ इसी गहरी सच्चाई को व्यक्त करती हैं:

“आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता, आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता…
लेकिन असली दर्द तब है — जब आदमी जिंदा रहते हुए सोचना और बोलना छोड़ देता है।”

इन शब्दों में वह कड़वी सच्चाई छिपी है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। मृत्यु केवल शरीर की समाप्ति नहीं है — वास्तविक मृत्यु तब होती है जब इंसान सोचना और बोलना बंद कर देता है।

सोच का मरना

सोचना मानव होने की सबसे बड़ी पहचान है। सवाल करना, समझना, कल्पना करना और सपने देखना — यही जीवन को अर्थ देता है। लेकिन जब इंसान सोचना बंद कर देता है, तब उसके भीतर धीरे-धीरे एक मौन मृत्यु शुरू हो जाती है।

कई लोग इसलिए नहीं सोचते क्योंकि वे असमर्थ हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि:

* समाज ने उन्हें चुप रहना सिखाया,

* आलोचना का डर है,

* असफलता का डर है,

या

* फिर उन्हें लगता है कि सोचने से कुछ बदलता नहीं।

जब सोचना बंद हो जाता है, तब इंसान मशीन बन जाता है — चलता है, काम करता है, लेकिन जीता नहीं।

बोलने का मरना

बोलना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है — यह भावनाओं, विचारों और सच्चाई को दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम है। लेकिन जीवन में एक समय ऐसा आता है जब इंसान चुप हो जाता है — इसलिए नहीं कि उसके पास कुछ कहने को नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि बोलना उसे भारी लगने लगता है।

कुछ लोग इसलिए चुप होते हैं क्योंकि:

उन्हें सुना नहीं जाता, उन्हें डर है कि उनकी बात गलत समझी जाएगी, उन्होंने खुद पर विश्वास खो दिया, या उनकी भावनाओं को बार-बार नज़रअंदाज़ किया गया ऐसी चुप्पी शांति नहीं — एक धीमा ज़हर होती है।

हर बार जब हम अपनी भावनाएँ दबाते हैं, कोई सच्चाई नहीं कहते, या खुद को व्यक्त करने से डरते हैं — तब हमारा अंदरूनी अस्तित्व थोड़ा-सा मर जाता है।

मरने से पहले जीना सीखिए

शारीरिक मृत्यु निश्चित है — कौन, कब और कैसे मरेगा, यह कोई नहीं जानता। लेकिन उससे भी जरूरी बात यह है कि मरने से पहले जिया जाए। जीना मतलब:

-गहराई से सोचना

-ईमानदारी से बोलना

-साहस से महसूस करना

-डर के खिलाफ सवाल करना

और

-लगातार बढ़ते रहना
– जो इंसान सोचना नहीं छोड़ता, वह जिंदा है।
– जो इंसान सच्चाई बोलता है, वह मजबूत है।
– जो इंसान महसूस करता है, वह इंसान है।

शारीरिक मृत्यु जीवन समाप्त करती है, लेकिन विचारों और शब्दों की मृत्यु उद्देश्य समाप्त कर देती है। इसलिए

* सोचिए।
* बोलिए।
* महसूस कीजिए।
* रुकिए मत।
और

*सचमुच जिएं — मौत से पहले।

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Rajeev Verma

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